-‘लूटे हुए मालपुए से बाजरे की रोटी भली’…’अधर्म से कमाया तो पीढ़ी खराब होगी’
कविता श्रीवास्तव
हमारा धर्म सबके लिए है। हमारा वेद जो कहता है वह हम मानेंगे। अन्य कुछ भी नहीं। हमारे वेद ने जो कहा है वह धर्म है बाकी अधर्म। यह बात परमाराध्य परमधर्माधीश ज्योतिषपीठाधीश्वर उत्तराम्नाय शंकराचार्य स्वामी श्री अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने शनिवार को श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए अपने दिव्य आशीर्वचन में कही। महाराजश्री यहां मुंबई में बोरीवली स्थित कोराकेंद्र मैदान में चल रहे अपने दिव्य भव्य चातुर्मास्य महामहोत्सव में उमड़े आस्थावान श्रद्धालुओ को संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर महाराजश्री ने कहा कि मनुष्य और पशु दोनों ही जीव हैं, लेकिन धर्म ने मनुष्य को पशुता से ऊपर उठाया है। पशु के पास धर्म नहीं है। मनुष्य के पास धर्म है। वह भविष्य के बारे में सोचता है। सुंदर भविष्य की कल्पना और उसके लिए व्यवस्था यही धर्म है। वर्तमान तो पिछली नींव पर खड़ा है। जिसको अपना भविष्य और भी अच्छा बनाना है उसे धर्माचरण करना पड़ेगा। सुंदर भविष्य के लिए धर्म का आचरण करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि पशु को भविष्य की चिंता नहीं है, लेकिन मनुष्य को वर्तमान भोगने के साथ भविष्य की भी चिंता है। इसीलिए मनुष्य का शरीर सर्वश्रेष्ठ शरीर है। मनुष्य शरीर शुभ कर्म से ऊपर उठता है और अधर्म से नीचे गिर जाता है।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने विज्ञान की वर्तमान तरक्की पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि अब विज्ञान भी हमारे शास्त्रों की बातों को सच कहने लगा है। हमारे शास्त्रों की सभी बातें एक-एक कर सिद्ध हो रही हैं। अंतरिक्ष अनुसंधान की ओर संकेत करते हुए उन्होंने कहा कि अब वैज्ञानिकों ने ऐसे विमान बनाए हैं, जो कुछ दूरी तक पहुंच कर अंतरिक्ष पर शोध कर रहे हैं। जबकि वर्षों पहले हमारे यहां पुष्पक विमान और इतने बड़े विमान हुआ करते थे, जिनमें खेत, खलियान, नदियां भी हुआ करती थीं। उन्होंने कहा कि हमारे कई पूर्वज स्वर्गलोक जाकर लौटे हैं। स्वर्गलोक और परलोक का जिक्र हमारे शास्त्रों में है। उन्होंने कहा विज्ञान खूब तरक्की करे और हमारे शास्त्रों की बातों को समझे और सिद्ध हो जाए जो पहले से ही हैं। वेदों में परलोक का उल्लेख है और यज्ञ करने से परलोक प्राप्त होता है।
जगद्गुरू स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि धन और मन दोनों ही कमाने की चीजें हैं, लेकिन अधर्म वाले केवल धन कमाते हैं। उस धन से प्रतिष्ठा नहीं केवल भोग सामग्रियां मिलती हैं। उन्होंने कहा कि लूटे हुए मालपुए से बाजरे की रोटी ही भली है। धर्म से उपार्जित धन सात पीढ़ी से पहले समाप्त नहीं होता, जबकि अधर्म से कमया धन कुछ दिनों बाद समाप्त हो जाता है और पहले का भी धन ले जाता है। उन्होंने कहा कि ऐसी कमाई मत करो वर्ना बच्चे कुमार्ग पर जाएंगे और आने वाली पीढ़ी खराब होगी। महाराजश्री ने कहा कि सामान्य धर्म सबके लिए है। विशेष धर्म विशेष लोगों के लिए है, लेकिन विशेष से पहले सबको सामान्य को जानना होगा और सबसे पहले धार्मिक बनना होगा।
