मुख्यपृष्ठस्तंभपूर्वांचल पॉलिटिक्स : इस्तीफा या राजनीतिक कद में वजीफा

पूर्वांचल पॉलिटिक्स : इस्तीफा या राजनीतिक कद में वजीफा

हिमांशु राज

भाजपा गठबंधन में शामिल अपना दल (एस) के विधायक शफीक अहमद अंसारी की राजनीति सिर्फ वक्त का संयोग नहीं, बल्कि सूझबूझ से बिछाई गई एक चतुर बिसात है। उन्होंने स्थानीय निकाय से लेकर विधानसभा तक स्वयं को धीरे-धीरे स्थापित किया और स्वार टांडा जैसी सीट पर वह कर दिखाया, जो कभी समाजवादी पार्टी का अभेद्य किला समझा जाता था। अब्दुल्ला आजम की अयोग्यता के बाद हुए उपचुनाव में उनकी जीत महज सरकार की रणनीतिक सफलता नहीं थी, बल्कि यह जनता के भीतर बदलाव की उस बेचैनी का संकेत था, जो लंबे समय से एक नए विकल्प की राह देख रही थी। शफीक अंसारी ने न सिर्फ स्वयं को ‘प्रभावशाली मुस्लिम चेहरा’ के रूप में प्रस्तुत किया, बल्कि भाजपा गठबंधन में रहते हुए अपने समुदाय के बीच संवाद बनाए रखने का प्रयास भी जारी रखा। यह काम आसान नहीं था, लेकिन राजनीति में आसान रास्ते से नहीं, बल्कि जोखिम उठाकर ही पहचान बनाई जाती है।
हाल ही में जब टांडा में दुकानों पर बुलडोजर चलने की सुगबुगाहट तेज हुई, तो विधायक अंसारी का वह प्रख्यात वक्तव्य सामने आया, जिसमें उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, `अगर किसी गरीब की दुकान टूटी, तो मैं विधायक पद से इस्तीफा दे दूंगा।’ उनके बयान ने प्रशासन और सरकार दोनों के बीच चर्चा को तीव्र कर दिया। ये शब्द सुनने में जितने जनसेवी लगते हैं, उतने ही राजनीतिक दांव का हिस्सा भी हो सकते हैं, क्योंकि जनता अब भावुकता से नहीं, व्यावहारिकता से सोचती है। सवाल भी यहीं से शुरू होता है कि जब दुकानें बन रही थीं और अतिक्रमण धीरे-धीरे जड़ें जमा रहा था, तब ऐसी चिंता कहां थी? क्या तब विधायक जी की नजरें दूसरी दिशा में थीं या प्रशासन से दूरी बनाए रखी गई? गौर करने की बात यह है कि अंसारी अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने के लिए न सिर्फ मुस्लिम वोट बैंक साध रहे हैं, बल्कि सरकार के प्रतिनिधि होने के नाते कानून और जनभावना के बीच संतुलन साधने की कोशिश भी करते हुए दिखाई देते हैं। उन्होंने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पार्टी प्रभारी जैसे महत्वपूर्ण पद प्राप्त किए हैं, जिससे उनका कद पार्टी और गठबंधन के भीतर लगातार ऊंचा हुआ है। इसीलिए उनके हर बयान को अब केवल व्यक्तिगत संवेदना नहीं, बल्कि रणनीतिक संदेश की तरह भी पढ़ा जा रहा है और जनता भी अब यह देखना चाहती है कि जनहित की जो बातें भाषणों में कही जाती हैं, क्या वे जमीन पर भी उसी ताकत से निभाई जाती हैं या वे केवल बयानबाजी के मोहरे होते हैं, जो बिसात पर चलते हैं पर मंजिल तय नहीं कर पाते।

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