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संपादकीय : पुणे के यवत को किसने जलाया?

मोदी काल में भारतीय समाज अत्यंत (अ) संवेदनशील और असंयमित बन गया है। यह तस्वीर देश की एकता के लिए अच्छी नहीं है। यही वजह है कि अन्य समुदायों, धर्मों का सम्मान करने और एक-दूसरे को समझने की भूमिका में बाधा उत्पन्न हुई है। दौंड (पुणे) तालुका के यवत में, एक युवक द्वारा व्हॉट्सऐप पर विवादास्पद स्टेटस रखने के चलते दो समूहों के बीच धार्मिक दंगा भड़क गया। पथराव, आगजनी और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचा। दंगे पर काबू पाने के लिए पुलिस को आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े। धारा १४४ लगानी पड़ी। ‘यवत’ में हुआ दंगा इस बात का उत्तम उदाहरण है कि महाराष्ट्र में कानून-व्यवस्था की स्थिति कितनी नाजुक और अनिश्चित है। इस मामले पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री द्वारा व्यक्त किए गए विचार ‘चकित’ करनेवाले हैं। मुख्यमंत्री फडणवीस कहते हैं, ‘मैंने यवत में हुई घटना का संज्ञान लिया है। एक बाहरी व्यक्ति द्वारा आपत्तिजनक स्टेटस रखने के कारण तनावपूर्ण स्थिति पैदा हो गई। लोग सड़कों पर उतर आए और भीड़ को नियंत्रित करने के लिए लाठीचार्ज करना पड़ा। कुछ लोग जानबूझकर तनाव पैदा करने के लिए ऐसे स्टेटस रखते हैं।’ मुख्यमंत्री की यह प्रतिक्रिया आश्चर्यजनक है, लेकिन अनुभवी उप मुख्यमंत्री अजीत पवार ने भी दंगों का ठीकरा एक युवक के व्हॉट्सऐप स्टेटस पर फोड़ा। अजीत पवार कहते हैं, ‘हम हालात पर नजर रख रहे हैं। धारा १४४ लागू कर दी गई है। यह शिव, शाहू, फुले और आंबेडकर का महाराष्ट्र है। सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखना महाराष्ट्र की परंपरा है।’ लेकिन सवाल यह है कि शिव, शाहू, फुले और आंबेडकर के महाराष्ट्र में
दंगे कौन भड़का रहा
है? जैसा कि अजीत पवार कहते हैं, उन्हें यह साफ करना चाहिए। सोशल मीडिया पर एक स्टेटस की वजह से हजारों लोग सड़कों पर उतर आते हैं और दंगे करते हैं। महाराष्ट्र के लोग कब से इतने ‘वेले’ हो गए? इसका मतलब है कि युवाओं के पास न रोजगार है, न काम है और न खेती से कोई आय है। उन्होंने सामान्य रूप से सोचना बंद कर दिया है। लोगों के लिए बस यही करना बाकी है कि वे धर्म के बारे में दिए गए निर्देशों का पालन करें और सड़कों पर दंगा करें। यह एक अग्रगत, प्रगतिशील महाराष्ट्र के लिए शोभा नहीं देता। यवत का दंगा हिंदू और मुसलमान के बीच था। इसे जाति आदि का कहकर क्यों छिपाया जाना चाहिए? हमें यह भी समझना चाहिए कि एक मुस्लिम युवक ने सोशल मीडिया पर वास्तव में क्या लिखा और हिंदुओं का माथा कैसे भड़काया गया। पुलिस ने दंगे का कारण बने बाहरी व्यक्ति को हिरासत में लिया और उसके खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी। लेकिन जो इतने पर ही थम जाए वे नव-हिंदुत्ववादी कैसे? अजीत पवार गुट के विधायक जगताप और भाजपा विधायक पडलकर यवत आए और लोगों को और भड़काया। परिणामस्वरूप, लोग सड़कों पर उतर आए और दंगे भड़क उठे इसलिए दंगे भड़काने वाले बाहरी लोग सत्तारूढ़ दल के ही हैं और ये बाहरी लोग ‘यवत’ में सिर्फ हिंदू-मुसलमानों के बीच तनाव बढ़ाने और दंगे भड़काने के लिए ही घुसे थे। जैसा कि अजीत पवार कहते हैं, क्या उप मुख्यमंत्री को यह नहीं पता कि शिव, शाहू, फुले और आंबेडकर के महाराष्ट्र के सांप्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ने वालों में उनकी पार्टी का ही विधायक है? राज्य में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है और उसके लोग महाराष्ट्र को आग लगाने पर उतारू हैं।
विधान सभा के द्वार पर
उपद्रव मचानेवाले दंगाई यवत में भी दंगा कर रहे हैं और मुख्यमंत्री कहते हैं, ‘मैं यवत के दंगों की जानकारी ले रहा हूं।’ अर्बन नक्सलवादियों की हिंसा रोकने के लिए मुख्यमंत्री जन सुरक्षा अधिनियम लाए। यवत के दंगाइयों पर अर्बन नक्सलवाद अधिनियम लगाकर उन्हें गिरफ्तार किया जाना चाहिए। नव-हिंदुत्ववादियों ने मुसलमानों के घर जलाए, दुकानें जलार्इं और मस्जिदों पर पथराव किया। उन्हें यह सब करने के लिए प्रोत्साहित करनेवाले पडलकर और जगताप कब से हिंदुत्ववादी हो गए? फिर इन नव-हिंदुत्ववादियों के नाजायज पिता राष्ट्रपति ट्रंप के सामने आत्मसमर्पण कर देते हैं और पाकिस्तान के खिलाफ ‘ऑपरेशन सिंदूर’ रोक देते हैं। राष्ट्रपति ट्रंप के आंखें तरेरते ही रूस से तेल की खरीद रोक देते हैं। क्या यही उनकी बहादुरी है? लेकिन इन नव-हिंदुत्ववादियों की बहादुरी सांप्रदायिक तनाव पैदा करने और दंगे कराने में ही उमड़-घुमड़ रही है। यह सही है कि श्री अजीत पवार कहते हैं कि यवत के ग्रामीणों को शांति और संयम बनाए रखना चाहिए। लेकिन यवत में शांति भंग करने का काम करनेवाले खुद सरकार ही में हैं। सोशल मीडिया पर ‘स्टेटस’ रखकर भावनाएं भड़काने के लिए संबंधित बाहरी व्यक्ति के खिलाफ कानूनी कार्रवाई पहले ही की जा चुकी है। पुलिस ने पहले ही सख्त कदम उठाए थे और इसे ही तो कानून का राज कहते हैं। इसी कानून के राज को उखाड़ फेंकने के लिए बाहर से दो विधायक आए और शांति भंग की। दौंड विधायक श्री राहुल कुल भी भाजपा के (नव-हिंदुत्ववादी) हैं। इसलिए इन नव-हिंदुत्ववादियों ने शांति स्थापित करने के बजाय, दंगे कैसे भड़कें इस पर ही ध्यान केंद्रित किया। बहरहाल, फडणवीस और अजीत पवार इस सवाल को लेकर परेशान हैं कि शिव, शाहू, फुले और आंबेडकर के महाराष्ट्र में सांप्रदायिक सद्भाव को कौन बिगाड़ रहा है?

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