मुख्यपृष्ठसमाज-संस्कृतिसनातन की मूल शिक्षा छिपाने से बढ़ रही विषमता : शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद

सनातन की मूल शिक्षा छिपाने से बढ़ रही विषमता : शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद

● ‘जमाखोरी पाप है’
● ‘बंटबारा सनातन का धर्म है’
● ‘अमीर-गरीब की खाई मिटाता है सनातन’

कविता श्रीवास्तव / मुंबई

ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती महाराज की दिव्य अमृतवाणी इन दिनों मुंबईवासी श्रद्धालओं में धार्मिक-आध्यात्मिक गंगा की पावन रसधार बहा रही है। प्रतिदिन प्रातः एवं सांय के प्रहार में हो रही उनकी अमृतवाणी को सुनने बड़ी संख्या में श्रद्धालु बोरीवली के कोराकेंद्र मैदान में पधार रहे हैं। सनातन संस्कारों की गूढ़ बातों पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि सनातन धर्म में जमाखोरी को पाप माना गया है। बंटवारा सनातन का धर्म है। जो भी उपलब्ध है उसमें से थोड़ा-थोड़ा सबको देना है। हमें जो कुछ भी मिलता है उसमें देवी-देवताओं और पशु-पक्षियों सहित समस्त प्राणियों के लिए बंटवारा करना है। हम भी जिएंगे दूसरों को भी जीने देंगे, यही सनातन की सोच है। जितने से तुम्हारा काम चल जाए, उतना ही तुम्हारा है। उससे ज्यादा इकट्ठा करोगे तो दूसरे का हक मारोगे। दूसरे का हक मारने वाला चोर होता है। उसको भगवान दंड देते हैं। इसीलिए तो सनातन धर्म में सबको समान माना गया है। ईश्वर की हर चीज पर सबका समान अधिकार है। सनातन धर्म अमीर-गरीब की खाई को मिटाता है। जिसके पास अधिक है, उसे दान देना है ऐसा भागवत में कहा गया है। लेकिन कथाकार इसे नहीं बताते हैं क्योंकि उनके पास बड़ी थैली वाले धनी होते हैं। यदि वे आवश्यकता से अधिक धन को दान करने की शिक्षा देंगे तो उनकी अपनी थैली की समस्या हो जाएगी।

दरअसल सनातन धर्म की मूल शिक्षा को छिपाया जा रहा है। इसी के कारण समाज में विषमता उत्पन्न हो रही है। जिसको जितनी जरूरत, उसकी उतनी पूर्ति करके देना है, यही जमानत सनातन का फार्मूला है। इसके लिए धार्मिक होना जरूरी है। इसके लिए जातियों का का वर्गीकरण होना जरूरी नहीं है। हमारे सनातन में इसीलिए पहली रोटी गाय को और आखिरी रोटी श्वान को दी जाती है, यही सनातन है। सब मिलकर खाते हैं, यही सनातन है।

बोरीवली के कोराकेंद्र मैदान पर जारी अपने चातुर्मास्य महोत्सव में श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंदजी ने कहा कि हर सनातनी को आत्मविमर्श और आत्मविचार करना चाहिए स्वयं को जाने बिना हम दूसरों को नहीं जान सकते हैं। दूसरों पर उपकार करना पुण्य है जबकि दूसरों को पीड़ा देना ही पाप है। यह ध्यान रखना चाहिए कि किसी बात से जैसा दुख मुझे होता है वैसा ही दुख दूसरे को भी होता है। उन्होंने एक कथा सुनाते हुए कहा कि हमारे पास आने वाला कोई भी मात्र अतिथि नहीं है वह स्वयं भगवान है यही भाव रखना चाहिए। क्योंकि भगवान अनेक रूपों में आते हैं। इसीलिए तुलसीदास ने कहा है…

तुलसी या संसार में, सबसे मिलिए धाय।
ना जाने किस वेश में नारायण मिल जाए।।

तभी तो सनातनी हर प्राणी को देवता के रूप में देखते हैं। हर किसी का स्वागत करना चाहिए। चाहे हमारे पास कुछ भी ना हो तो हम अपने मुख की मधुर वाणी से भी उसका स्वागत कर सकते हैं।

शंकराचार्य का दिव्य-भव्य चातुर्मास्य महामहोत्सव 7 सितंबर तक मुंबई में चलेगा। आयोजन स्थल पर 33 कोटी गौ-प्रतिष्ठा महायज्ञ की परिक्रमा और आहुतियों के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ निरंतर बढ़ रही है।

अन्य समाचार