डाॅ. रवीन्द्र कुमार
कचौड़ी का प्राचीन काल से भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान है। किन्तु कचौड़ी के रूप प्रकार को लेकर हमेशा विवाद रहा है। उसके वजन को लेकर भी मानकीकरण नहीं है। कचौड़ी के साथ यह अन्यायपूर्ण ट्रीटमेंट सतत चल रहा है। अतः कोई संदेह नहीं की इन सब के चलते कचौड़ी आम जनता और गरीब मतदाताओं से दूर से दूर होती जा रही है। सरकार ने भी अभी तक कचौड़ी की ओर समुचित ध्यान नहीं दिया है। कचौड़ी के रेट अलग अलग हैं तो उसके अंदर की ‘फिलिंग’ भी अजब गजब है। कहीं मटर डालते हैं कहीं नहीं डालते। कहीं आलू डालते हैं, कहीं मूंग की दाल। अब तो हद हो गई है, क्योंकि अब कीमा-कचौड़ी भी उपलब्ध है।
इस प्रकार कचौड़ी के साथ यह संयोग बोलो, प्रयोग बोलो, चल रहा है। कचौड़ी हमारा ‘इमोशनल इशू’ है। कचौड़ी के साथ और उसके खाने वाले दोनों के साथ यह भेदभावपूर्ण रवैया अब और नहीं सहा जाएगा। यह क्या कि कहीं तो बिना किसी ‘फिलिंग’ के कचौड़ी बाज़ार में धड़ल्ले से बेची जा रही है और सरकार है कि हाथ पर हाथ धरे बैठी है। यह कानूनन अपराध घोषित किया जाना चाहिए। जो भी बिना ‘फिलिंग’ के किसी भी खाद्य सामग्री को कचौड़ी कह कर बेचना गंभीर अपराध घोषित किया जाये। यह ग्राहक को ‘मिस-लीड’ करने का असफल प्रयास है।
कचौड़ी के दाम को लेकर भी एकरूपता नहीं दिखती है। कहीं दस रुपये की एक है।कहीं बीस रुपये की, तो कहीं पचास रुपये की एक। यह क्या बात हुई ? कहां गया ‘वन नेशन वन कचौड़ी’ का सिद्धांत? कचौड़ी के साइज को लेकर भी गहन असंतोष समाज में व्याप्त है। कभी भी यह स्थिति विस्फोटक हो सकती है। ये क्या ? कहीं तो कचौड़ी इतनी छोटी है कि जैसे आप पापड़ी खा रहे हैं। कहीं इतनी बड़ी है कि एक प्लेट में एक कचौड़ी मुश्किल से आ पाती है। यह भेदभाव पूंजीवाद का द्योतक है।
सरकार से ये पुरजोर मांग है कि कचौड़ी को इस बाह्य दबाव से बचाया जाये और इसके मुतल्लिक संसद में बिल जल्द से जल्द लाया जाये। यह क्या कि कहीं मावा की कचौड़ी, कहीं मूंग की दाल की कचौड़ी, कहीं प्याज की कचौड़ी कहीं आलू की कचौड़ी, कीमा कचौड़ी, मिक्स कचौड़ी, कचौड़ी अनंत…कचौड़ी कथा अनंता। अब वक़्त आ गया है कि ‘वन नेशन-वन कचौड़ी’ के अनुरूप राष्ट्र की एक ही कचौड़ी होनी चाहिए। इसी प्रकार चटनी को लेकर भी नियम कायदे बनने चाहिए। जैसे कि यह अलग अलग चटनी नहीं चलेगी। कहीं हरी चटनी, कहीं लाल चटनी, कहीं कहीं तो सॉस भी दी जाती है। यह विदेशी निर्भरता समाप्त होनी चाहिए। आई. एस. आई. अथवा आई. एस. ओ. प्रमाणित एक ही तरह की कचौड़ी और एक ही तरह की चटनी पूरे भारत वर्ष में कश्मीर से कन्या कुमारी और जूनागढ़ से जोरहाट तक लागू किया जाय।
(लेखक रेलवे के एक वरिष्ठ रिटायर्ड अधिकारी हैं। वह एक प्रतिष्ठित कवि और व्यंग्यकार हैं)
