कोल्हापुर के नांदणी मठ की हथिनी महादेवी उर्फ माधुरी ने देश के कई लोगों को चौंका दिया है। इसने कई लोगों की आंखों में आंसू ला दिए। एक बूढ़ी हथिनी ने धाकड़ और अक्खड़ कोल्हापुरियों की आंखों में आंसू ला दिए। इसके कारण, देशभर में शोध शुरू हो गया है कि यह माधुरी कौन है। माधुरी चालीस वर्षों तक नांदणी के जैन मठ में थी। उसने मठ की सभी धार्मिक गतिविधियों में भाग लिया। वह वहां आनेवाले भक्तों को प्रिय थी। मठ द्वारा माधुरी की देखभाल की जा रही थी, लेकिन अब पशु अधिकार संगठन ‘पेटा’ ने पैâसला किया कि थकी हुई माधुरी को आराम और अधिक देखभाल की जरूरत है। मामला उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय तक गया और अदालत ने भी ‘पेटा’ की बात को स्वीकार कर लिया। अंबानी परिवार गुजरात के जामनगर में बीमार और बूढ़े जानवरों के लिए ‘वनतारा’ नामक एक पहल चला रहा है। जब माधुरी को उस वनतारा में ले जाने की बात आई तो पूरा नांदणी गांव और कोल्हापुरवासी रोने लगे। माधुरी का रास्ता रोकने लगे। चालीस साल के साथ के बाद स्वजनों से विदा लेते समय माधुरी अपने पैर नहीं उठा रही थी इसलिए सवाल उठता है कि क्या माधुरी को जबरदस्ती गुजरात ले जाया गया है? माधुरी को एक तरह से पशुओं के वृद्धाश्रम में धकेल दिया गया और कोल्हापुर के लोग इसके खिलाफ हैं। माधुरी के लिए हजारों लोग सड़कों पर उतर आए। वे दहाड़ मारकर रोए, यानी उसे नांदणी मठ से पशुओं के वृद्धाश्रम भेजने की कोई जरूरत नहीं थी। लोगों ने माधुरी को वनतारा से कोल्हापुर वापस लाने के लिए एक आंदोलन और हस्ताक्षर अभियान चलाया। नांदणीr मठ जैनियों का है और वर्तमान में ज्यादातर जैन बंधु भाजपा के समर्थक हैं, लेकिन माधुरी के मामले में जैन मुनियों और धर्मगुरुओं ने भाजपा के नाम पर चेतावनी दी। आचार्य गुणाधर नंदीजी महाराज ने गुस्से में कहा, ‘देवेंद्र फडणवीस, आप एक निर्दयी मुख्यमंत्री हैं। मैं आपकी जिंदगी को धिक्कारता हूं। जो व्यक्ति समाज और पशुओं के आंसू नहीं पोंछ सकता, वह ज्यादा समय तक अपनी सरकार नहीं चला पाएगा। वह
सत्ताभ्रष्ट
हो जाएगा। जिंदगी में ज्यादा तरक्की नहीं कर पाओगे। देवेंद्र फडणवीस, तुम अंबानी की गोद में बैठकर काम कर रहे हो।’ आचार्य गुणाधर नंदीजी महाराज ने फडणवीस और उनकी सरकार को ऐसा श्राप दिया और इस तरह अपने गुस्से का इजहार किया। जैन आमतौर पर संयमी व शांत और अहिंसक व धार्मिक होते हैं, लेकिन माधुरी हथिनी को लेकर यह समुदाय बेहद आक्रामक और आक्रोशित हो गया और उन्होंने रिलायंस कंपनी के ‘जियो मोबाइल कार्ड’ को वापस करने के लिए कोल्हापुर में एक बड़ा आंदोलन किया। लोगों ने कहा कि अगर लोगों के मन में यह बात आ गई तो वे रिलायंस के शेयरों की कीमत गिरा देंगे। कोल्हापुर में जैन समुदाय माधुरी की वापसी के लिए कई अन्य तरीकों से आंदोलन कर रहा है। कोल्हापुर, इचलकरंजी, सांगली क्षेत्रों में जैन समुदाय बड़ी संख्या में मतदाता हैं इसलिए सभी दलों के नेता यह दिखावा कर रहे हैं कि वे माधुरी के लिए विशेष प्रयास कर रहे हैं। यह दया ही होगी। हालांकि, किसान भूख और कर्ज से मर रहे हैं। महिलाओं पर अत्याचार हो रहे हैं। युवा बेरोजगारी के कारण कंगाल चुके हैं। इस पर कोई आंसू नहीं बहा रहा है, लेकिन माधुरी के मामले में राजनीतिक लाभ हासिल करने के लिए ऐसा लगता है कि कई लोगों की छाती दुख से फट गई है। मामला दिल्ली भी ले जाया गया। नांदणी मठ के लोग भी संघर्ष कर रहे हैं। नांदणी मठ की इस माधुरी ने दिसंबर २०१७ में ‘मठ’ के मुख्य पुजारी पर हमला किया। माधुरी को दूसरे राज्यों में धार्मिक उत्सवों के लिए कम से कम पंद्रह बार महाराष्ट्र से बाहर भेजा गया था। मुहर्रम के जुलूस में भी उसे घुमाया गया था। सच्चाई केवल ‘मठ’ के लोग ही जानते हैं। इस बीच, जब माधुरी का संतुलन बिगड़ गया तो उसे अन्यत्र इलाज के लिए वन विभाग को दिया गया और इसकी सिफारिश किसान नेता राजू शेट्टी ने की थी। इसमें कुछ भी गलत नहीं था। एक जानवर का इलाज करना, उसे देखभाल के लिए उपयुक्त स्थान पर भेजना जानवरों के प्रति करुणा है। अंबानी की ‘वनतारा’ परियोजना में देशभर के कई बीमार, घायल और बूढ़े जानवरों की देखभाल की जाती है। चूंकि यह परियोजना अंबानी की है इसलिए
टीका टिप्पणी का
कोई मतलब नहीं। १८८३ में पारसी उद्योगपति सर दिनशॉ मानेकजी पेटिट ने मुंबई के परेल में एक बैलघोड़ा अस्पताल स्थापित किया था। यह अस्पताल जानवरों की देखभाल के लिए बनाया गया था। कई उद्योगपति अपने मुनाफे का कुछ हिस्सा जानवरों की देखभाल पर खर्च करते हैं। टाटा समूह और वाडिया समूह ने कई वर्षों तक यह काम चलाया। अब अगर अंबानी ऐसा कर रहे हैं तो इसकी आलोचना करने का कोई मतलब नहीं है। श्रीलंका में एक ‘नर्सिंग होम’ है, जो बीमार और घायल हाथियों की देखभाल करता है और वहां का काम देखने लायक है। सवाल यह है कि ‘पेटा’ ने नांदणी मठ की माधुरी का मुद्दा उठाया और इस हथिनी को दया के नाम पर अंबानी वनतारा में भेज दिया। क्या भारत में ‘पेटा’ के लिए बस इतना हाr बचा है? भारत के शहरों और गांवों में, सड़कों पर, खेतों में आवारा कुत्ते बढ़ गए हैं। उन्हें खाना-पीना नहीं मिलता। इससे सड़कों पर चलने फिरनेवाले लोग परेशान होते हैं। ‘पेटा’ और वनतारा को इन आवारा कुत्तों की देखभाल की जिम्मेदारी लेनी चाहिए। लावारिस गायें और बैल सड़कों पर खुलेआम घूमते हैं। गायों को ठीक से खाना नहीं मिलता। उनके पेट से ‘प्लास्टिक’ निकलता है। गौशालाएं बनाकर हिंदुत्व की राजनीति चलती रहती है, लेकिन पशुओं को चारे-पानी के अभाव में तड़पना पड़ता है। यह आश्चर्य की बात है कि ‘पेटा’ माधुरी की तरह इन गायों और बैलों की देखभाल नहीं करता और न ही वनतारा इन जानवरों की सेवा करता है। अगर नांदणी मठ की हथिनी माधुरी के प्रति जितनी करुणा दर्शाई जा रही है उतनी ही करुणा अन्य जानवरों के प्रति नहीं दिखाई जा रही है तो ‘माधुरी’ को लेकर जो खेल चल रहा है, उसे नाटक ही मानना पड़ेगा। इंसान का जीना दूभर हो गया है। गरीबी और भुखमरी के चलते इंसान-इंसान को खा रहा है, मार रहा है। इसके लिए वर्तमान ‘गुजरात पैटर्न’ के हुक्मरान जिम्मेदार हैं। जिन्होंने गुजरात पैटर्न की सरकार को भारी मत दिया, वे नांदणी मठ की माधुरी के लिए रो रहे हैं, लड़ रहे हैं, श्राप दे रहे हैं। ईश्वर से प्रार्थना है कि १४० करोड़ लोगों को माधुरी जैसी किस्मत मिले! माधुरी आज गुजरात चली गई है। कोल्हापुर के लोग उसे महाराष्ट्र लाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उनके संघर्ष को शुभकामनाएं!
