द्विजेंद्र तिवारी मुंबई
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में रूस के साथ भारत को एक ‘डेड इकॉनमी’ यानी निर्जीव अर्थव्यवस्था करार दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अभिन्न मित्र से ऐसे बयान की उम्मीद नहीं थी। गले मिलनेवाला इतना आत्मीय भला ऐसी टिप्पणी वैâसे कर सकता है? मोदी जी के ११ वर्ष के कार्यकाल में इतना बड़ा झटका शायद किसी ने नहीं दिया होगा। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने ट्रंप के बयान पर मोदीजी की जमकर घेराबंदी की है। अपने लंबे कार्यकाल में भारत को ग्यारहवीं से चौथी अर्थव्यवस्था बनाने पर जो वाहवाही लूटी जा रही थी, उसे एक झटके में ट्रंप ने हवा में उड़ा दिया।
हो सकता है कि भारत को इतनी खराब उपमा देने के पीछे ट्रंप की कोई रणनीति हो, भ्रम पैâलाने और दबाव डालने के लिए बोला गया झूठ हो, पैंतरा हो या कूटनीति हो, पर हम भारत के लोग इसे हलके में नहीं ले सकते। सवाल देश की अंतर्राष्ट्रीय छवि और विदेशी निवेश पर आसन्न संकट का है तो हमें आत्मावलोकन करना ही होगा। ठोस आंकड़ों और संरचनात्मक अवलोकनों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि भारत की अर्थव्यवस्था अपने विकास के दावों के बावजूद प्रमुख क्षेत्रों में ठहराव पर है और समान, स्थाई समृद्धि प्रदान करने में विफल रही है।
नौकरी विहीन विकास
भारत की ६ प्रतिशत या ७ प्रतिशत की मुख्य जीडीपी वृद्धि एक गंभीर मुद्दे ‘रोजगार विहीन विकास’ पर बहुत अधिक परदा डाल रही है। सीएमआईई (भारतीय अर्थव्यवस्था निगरानी केंद्र) के अनुसार, हाल के वर्षों में भारत में बेरोजगारी औसतन लगभग ७ प्रतिशत रही है, जिसमें युवा बेरोजगारी २० प्रतिशत से अधिक है। औपचारिक रोजगार सृजन स्थिर हो गया है। रोजगार वाले हाथों का एक बड़ा हिस्सा ‘कम उत्पादकता वाले अनौपचारिक या बाइक पर खाना परोसने के गिग वर्क’ में धकेल दिया गया है। शिक्षित स्नातक भी स्थिर रोजगार के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जो विकास मॉडल में संरचनात्मक खामियों को दर्शाता है।
अरबपतियों की संख्या में वृद्धि के साथ भारत में आय और धन की असमानता तेजी से बढ़ी है। स्वयंसेवी संस्था ऑक्सपैâम के अनुसार, शीर्ष एक प्रतिशत भारतीयों के पास देश की ४० प्रतिशत से अधिक संपत्ति है। आबादी के निचले आधे हिस्से की वास्तविक कमाई स्थिर या कम हो गई है। ८० करोड़ से ज्यादा लोग अभी भी सरकार की खाद्य सब्सिडी योजना के तहत मुफ्त अनाज पर निर्भर हैं, जो व्यापक आर्थिक कमजोरी का एक स्पष्ट संकेत है।
घटता मध्यम वर्ग और उपभोक्ता
भारत के मध्यम वर्ग को कभी विकास का इंजन कहा जाता था, लेकिन अब उसकी सापेक्ष क्रय शक्ति में कमी आई है। ग्रामीण ग्राहकी में कमी आ रही है और सामान्य उपयोग की वस्तुओं और यहां तक कि साबुन और खाना पकाने के तेल जैसी बुनियादी चीजों की मांग में प्रति व्यक्ति के अनुपात में गिरावट आ रही है। निर्जीव अर्थव्यवस्था का यह लक्षण है, जहां बहुसंख्य आबादी खर्च करने में असमर्थ होने लगती है।
सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) क्षेत्र भारत में ३० प्रतिशत रोजगार प्रदान करता है। नोटबंदी (२०१६) और त्रुटिपूर्ण जीएसटी कार्यान्वयन (२०१७) से इसे भारी नुकसान हुआ। कई क्षेत्र उबर नहीं पाए। वर्षों से चल रहे ‘मेक इन इंडिया’ अभियानों के बावजूद, सकल घरेलू उत्पाद में विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी मुश्किल से ही बढ़ी है। निर्यात अस्थिर बना हुआ है और चीन के साथ भारत बड़ा व्यापार घाटा झेल रहा है।
कृषि और ग्रामीण संकट
लगभग ५० प्रतिशत भारतीय कृषि पर निर्भर हैं, फिर भी यह क्षेत्र सकल घरेलू उत्पाद में केवल लगभग १६ प्रतिशत का योगदान देता है। किसानों की आय बेहद कम है और ज्यादातर किसान कर्ज के बोझ से दबे हुए हैं।
हाल के वर्षों में ‘वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता सूचकांक’ में भारत का स्थान गिरा है। लालफीताशाही, न्यायिक देरी, खराब लॉजिस्टिक्स और कुशल श्रमिकों की कमी निवेश में बाधा डाल रही है। फोर्ड और जीएम जैसी बड़ी कंपनियों का बाहर निकलना दर्शाता है कि भारत अभी भी विदेशी कंपनियों को व्यापार के लिए कठिन जगह लगती है।
करोड़ों देशवासियों को ट्रंप की बयानबाजी बहुत अपमानजनक लगी है। आशंका यह भी है कि उनके इस बयान से दुनिया भर के निवेशकों के बीच संशय का माहौल बन सकता है। बेहतर होगा कि ट्रंप की बयानबाजी में उलझने के बजाय, हम अपना घर सुधार लें।
(लेखक कई पत्र पत्रिकाओं के संपादक रहे हैं और राजनीतिक मामलों के जानकार हैं)
