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मनपा अस्पताल में आईसीयू संभाल रहा है फर्जी डॉक्टर! …१० बेड का है आईसीयू, लपेटे में हैं सुपरिटेंडेंट

सामना संवाददाता / मुंबई
मुंबई का वीएन देसाई मनपा अस्पताल मरीजों की जिंदगी से खुलेआम खिलवाड़ कर रहा है। आईसीयू जैसे अति संवेदनशील विभाग को एक फर्जी डॉक्टर के हवाले कर दिया गया और जब मामला सामने आया तो अस्पताल प्रशासन ने चार महीनों से सिर्फ फाइलें घुमा-घुमाकर जिम्मेदारी टालने का खेल खेला। इस मामले में न एफआईआर हुई और न ही कोई कड़ी कार्रवाई की गई इसीलिए अब मेडिकल सुपरिटेंडेंट पर सवाल उठने लगे हैं। साथ ही यह कहा जा रहा है कि क्या मरीजों की जान की कोई कीमत नहीं है।
सूत्रों के मुताबिक, आईसीयू का संचालन मेसर्स साई संजीवनी पॉली क्लिनिक एंड नर्सिंग होम नामक निजी ठेकेदार कंपनी को सौंपा गया था, जिसने २०२२ में डॉक्टर भरत सावंत को बतौर एमडी नियुक्त किया था। सावंत ने विदेशी डिग्री और महाराष्ट्र मेडिकल काउंसिल का एक कथित पत्र देकर खुद को अधिकृत डॉक्टर बताया। इसी आधार पर वह महीनों तक आईसीयू चला रहा था और गंभीर मरीजों का इलाज कर रहा था। लेकिन जांच में सामने आया कि वह पत्र फर्जी था और सावंत का महाराष्ट्र मेडिकल काउंसिल में कोई रजिस्ट्रेशन ही नहीं था।
चौंकाने वाली बात यह है कि अस्पताल प्रशासन को फरवरी २०२५ में ही शक हो गया था और दस्तावेजों की पुष्टि के लिए एमएमसी को पत्र भेजा गया था। अप्रैल में एमएमसी ने साफ कर दिया कि न तो भरत सावंत ने पंजीकरण कराया है और न ही कोई वैध प्रमाणपत्र उनके पास है। इसके बावजूद न एफआईआर दर्ज की गई, न सावंत के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई हुई। उलटा मेडिकल सुपरिटेंडेंट ने मामले को दबाने की कोशिश में इसे अलग-अलग विभागों में घुमा दिया, ताकि खुद की भूमिका पर सवाल न उठें।
ठेके पर ४ अन्य अस्पतालों के आईसीयू
सूत्रों के मुताबिक मुंबई मनपा द्वारा संचालित बांद्रा के भाभा अस्पताल में १२, वीएन देसाई अस्पताल में १०, कांदिवली के शताब्दी अस्पताल में ३० और विक्रोली के महात्मा ज्योतिबा फुले अस्पताल में १० आईसीयू बेड वाले वार्डों को ठेके पर चलाने के लिए दिया गया है।
कोई बात करने को तैयार नहीं
इस बारे में जब वीएन देसाई के सुपरिटेंडेंट डॉ. जयराज से संपर्क किया तो उन्होंने कॉल तो उठाया, लेकिन जैसे ही उन्हें आभास हुआ कि किस मुद्दे पर बात हो सकती है तो उन्होंने बिना बात किए ही तुरंत कॉल काट दिया। इसी तरह सावंत और ठेकेदार कंपनी से भी संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन किसी से भी बात नहीं हो सकी।

जांच में सामने आया फर्जीवाड़ा
जानकारी ये भी सामने आई है कि जब भरत सावंत की नियुक्ति हुई थी, उस वक्त मौजूदा मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ. जयराज आचार्य को ही आईसीयू की निगरानी की जिम्मेदारी दी गई थी। हालांकि, बाद में प्रमोशन मिलने के कुछ महीनों के भीतर उन्होंने यह जिम्मेदारी अपने जूनियर डॉक्टर को सौंप दी। जब नए प्रभारी के दस्तावेजों की जांच हुई, तब जाकर फर्जीवाड़ा उजागर हुआ। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि क्या डॉ. जयराज ने जानबूझकर दस्तावेजों को नजरअंदाज किया था, या फिर यह लापरवाही महज संयोग थी? मामले की परतें जितनी खुल रही हैं, उतनी ही मेडिकल सुपरिटेंडेंट की भूमिका गहराती जा रही है।

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