महायुति सरकार की अनदेखी का है असर
सामना संवाददाता / मुंबई
देश और राज्य में शिक्षा की बड़ी-बड़ी नीतियां बनती हैं, घोषणाएं होती हैं, लेकिन बच्चों की पीठ पर चढ़ा बैग का बोझ आज भी जस का तस है। केंद्र सरकार ने साल २००६ में तय किया था कि छात्रों का बैग उनके वजन के १० फीसदी से ज्यादा नहीं होना चाहिए, पर कई सालों बाद भी ये नियम सिर्फ कागजों तक ही सीमित है। राज्य की महायुति सरकार इस दिशा में गंभीर नहीं दिख रही और नतीजा ये है कि स्कूल जाने वाले मासूम बच्चे हर दिन अपनी सेहत और रीढ़ की हड्डी का नुकसान झेल रहे हैं। ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि इतने सालों में सरकार ने इसे लेकर आखिर क्या किया।
बच्चों को रोजाना ५ से ७ किलो तक बैग उठाकर स्कूल जाना पड़ता है। बैग का वजन बच्चे की सहनशक्ति से कहीं ज्यादा हो जाता है। कई निजी स्कूल तो अब भी अतिरिक्त किताबें और रजिस्टर लाने का दबाव बना रहे हैं, जिससे बच्चों की सेहत पर सीधा असर पड़ रहा है। महत्वपूर्ण बात यह है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति और केंद्र सरकार की वर्ष २००६ की गाइडलाइंस में स्पष्ट कहा गया है कि छात्रों का बैग उनके वजन के १० प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए। इसके बावजूद राज्य के ज्यादातर स्कूलों में इस नियम की खुलेआम अनदेखी हो रही है। इसके साथ ही स्कूलों में न तो कक्षाओं में लॉकर्स की सुविधा है और न ही टाइमटेबल इस तरह से बनाया गया है कि बच्चों को हर दिन सभी किताबें ले जाने की जरूरत न पड़े। शिक्षा विभाग की उदासीनता और स्कूलों की मनमानी ने बच्चों की पीठ पर वह बोझ लाद दिया है, जिसकी कीमत वे आज अपनी सेहत ़खोकर चुका रहे हैं।
बालविकास विशेषज्ञ दे रहे चेतावनी
बालविकास विशेषज्ञ भी लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि बैग के बढ़ते बोझ का बच्चों के शारीरिक विकास पर गंभीर असर पड़ रहा है। डॉ. सुनील गोडबोले का कहना है कि आज के समय में बच्चों पर सिर्फ किताबों का ही नहीं, बल्कि अति-अभ्यास और अपेक्षाओं का भी दबाव बढ़ता जा रहा है। स्कूलों को चाहिए कि टाइमटेबल में बदलाव कर हर दिन कम विषय पढ़ाए जाएं। साथ ही कला, खेल और जीवन शिक्षा जैसे विषयों को भी बराबर महत्व दिया जाए, क्योंकि इनसे बच्चों को बैग से भी कुछ राहत मिलती है।
…तो राज्य भर में होगा आंदोलन
अब पालक संगठन खुलकर सामने आ गए हैं। ‘महापेरेंट्स पालक संगठन’ के अध्यक्ष दिलीपसिंह विश्वकर्मा ने शिक्षामंत्री को निवेदन देकर चेताव्ानी दी है कि अगर बैग के वजन को लेकर बनी नियमावली को तुरंत लागू नहीं किया गया तो राज्य भर में आंदोलन छेड़ा जाएगा। उनका कहना है कि सरकार और शिक्षा विभाग की ढिलाई का खामियाजा मासूम बच्चों को भुगतना पड़ रहा है। यह केवल शारीरिक नहीं, मानसिक बोझ भी बन चुका है, जिससे बच्चों की एकाग्रता, विकास और आत्मविश्वास प्रभावित हो रहा है।
