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मूल उद्देश्य से न भटके मुख्यमंत्री राहत कोष … हाई कोर्ट का सख्त आदेश

सामना संवाददाता / मुंबई
मुंबई हाई कोर्ट ने मुख्यमंत्री राहत कोष की स्थापना जिस उद्देश्य से की गई थी, उस उद्देश्य के तहत उपयोग करने का आदेश दिया है। इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि मुख्यमंत्री कोष के निधि वितरण की निगरानी न्यायालय नहीं रख सकता है। मुख्य न्यायाधीश आलोक अराधे और न्यायमूर्ति संदीप मरणे की पीठ ने यह भी कहा कि जनता सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत जानकारी प्राप्त करके मुख्यमंत्री कोष के लेन-देन को देख सकती है।
पब्लिक कंसर्न फॉर गवर्नेंस ट्रस्ट ने एक जनहित याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि इस कोष का उपयोग अन्य उद्देश्यों के लिए किया जा रहा है और इस कोष की निगरानी की मांग की थी। न्यायालय ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए पैâसला दिया है। याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि मुख्यमंत्री राहत कोष का उपयोग केवल प्राकृतिक आपदाओं और इसी तरह की घटनाओं के पीड़ितों की मदद के लिए किया जाना चाहिए। याचिकाकर्ता ने यह भी दावा किया था कि इस कोष की स्थापना इसी उद्देश्य के लिए की गई थी। सरकार ने इस याचिका का विरोध किया। सरकारी वकीलों ने कोर्ट को बताया कि २००१ में मुख्यमंत्री राहत कोष में संशोधन किया गया था। इस संशोधन में प्राकृतिक आपदाओं के अलावा अन्य घटनाओं के पीड़ितों को भी इसमें समाहित किया गया है।
याचिका में दावा
याचिका में दावा किया गया था कि मुख्यमंत्री द्वारा मुख्यमंत्री कोष का उपयोग सांस्कृतिक हॉलों के निर्माण, प्रतियोगिताओं के लिए टीमों को प्रायोजित करने और राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थाओं को व्यक्तिगत ऋण प्रदान करने जैसे अन्य उद्देश्यों के लिए किया जा रहा है इसलिए मुख्यमंत्री राहत कोष के वितरण का प्रबंधन करने और इसके खातों का ऑडिट करने के लिए एक समिति गठित की जाए।
सरकार का जवाब
-इस पर सरकार ने अदालत को बताया कि सांस्कृतिक और खेल गतिविधियों को बढ़ावा देना भी मुख्यमंत्री कोष के उद्देश्यों में से एक है।
-कोष का संचालन पारदर्शी तरीके से किया जा रहा है और इसके लेन-देन से संबंधित जानकारी सूचना के अधिकार अधिनियम के माध्यम से प्राप्त की जा सकती है।

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