राज्य चुनाव आयुक्त ने दिवाली के बाद स्थानीय स्वशासन निकायों के चुनावों के संकेत दिए हैं। पिछले तीन-साढ़े तीन साल से मुंबई समेत २७ महानगरपालिकाओं, जिला परिषदों और नगरपालिकाओं पर जनता की सत्ता नहीं है। सरकार ने चुनाव नहीं होने दिए और अपने-अपने लोगों को प्रशासक नियुक्त करके स्थानीय स्वशासन निकायों पर राज किया। मिंधे, फडणवीस और अन्य ने कारण बताने और पिछले कारण समाप्त होने के बाद नए कारण खोजने का खेल खेला, लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव कराने का टाइम टेबल दे दिया है, तो यह आगे बढ़ाने की टालमटोल नीति पर ब्रेक लग गया है। नगरपालिका चुनावों में जो गड़बड़ी की जा रही है, वैसी गड़बड़ी पहले कभी नहीं हुई, लेकिन भाजपा और उसके सहयोगियों की नीति आपत्तियां, भ्रम और अदालती याचिकाएं दायर करके मुद्दे बनाना और वक्त बर्बाद करना है। इस दौरान चुनाव आयोग में उनके वैâडर के लोग नियुक्त किए गए। जिला प्रशासनिक स्तर पर उनके अपने लोगों को ठूंसा गया। यहां तक कि न्यायपालिका में भी, उच्च न्यायालय तक भाजपा के प्रवक्ता नियुक्त किए जाने के बाद चुनाव करवाए गए और उसी नजरिए से वे मुंबई जैसे शहरों में बैठकर कबूतरों को दाना डालते रहे। राज्य चुनाव आयुक्त श्री वाघमारे कहते हैं, ‘नगरपालिका, जिला परिषद, पंचायत समिति और नगरपालिका के चुनाव एक साथ नहीं होंगे। ये चरणबद्ध तरीके से होंगे। यह तय नहीं है कि कौन से चुनाव पहले होंगे या बाद में।’ इन चुनावों में
वीवीपैट मशीन का उपयोग
नहीं किया जाएगा। (अर्थात, बटन दबाकर यह जानने की कोई व्यवस्था नहीं है कि वास्तव में किसे वोट दिया गया।) मतदाता सूची में भी कोई बदलाव नहीं होगा, ऐसा राज्य चुनाव आयुक्त ने सूचित किया। चुनावों में ईवीएम का उपयोग किया जाएगा, लेकिन वीवीपैट मशीन, जो पर्ची के रूप में बताती है कि मतदाता ने किसे वोट दिया, का उपयोग नहीं किया जाएगा। (यह संदिग्ध है।) क्या हमारे चुनाव आयोग को नहीं पता कि भारत दुनिया की तीसरी या चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और भारत ‘ऑपरेशन सिंदूर’ युद्ध में अपनी जीत का जश्न मना रहा है? चुनाव आयोग कह रहा है कि वीवीपैट मशीन का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा क्योंकि मतदान प्रक्रिया में समय लगता है। भाजपा ईवीएम पर जोर देती है, ताकि चुनाव प्रक्रिया में समय न लगे। ईवीएम मशीन दुनिया के लोकतंत्र में सबसे बड़ा प्रâॉड है। फिर भी भारत में इनका इस्तेमाल होता है। भारत का चुनाव आयोग और उसके राजनीतिक बाप का कहना है कि ईवीएम पारदर्शी हैं और समय बचाती हैं। तो ईवीएम मशीन से जुड़े वीवीपैट मशीन से दूरी क्यों बना रहे हो? यह गोलमाल है। अगर ईवीएम और वीवीपैट के कारण मतदान प्रक्रिया में समय लग रहा है, तो बैलेट पेपर से चुनाव कराना ही एकमात्र विकल्प है। लोकतंत्र की रक्षा के लिए यह जरूरी है। लोगों के मन में इस बात को लेकर कोई संदेह नहीं है कि हाई कोर्ट के न्याय आसन पर अपने प्रवक्ताओं को बिठाने वाली मोदी-शाह की भाजपा चुनाव जीतने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है। राज्य चुनाव आयोग कह रहा है कि स्थानीय निकाय चुनावों के लिए मध्य प्रदेश से २५,००० वोटिंग मशीनें लाई जाएंगी। यहीं
संदेह की सुई
चुभती है। भाजपा ने मध्य प्रदेश में ‘ईवीएम’ में हेराफेरी करके विधानसभा चुनाव जीता। मध्य प्रदेश में भाजपा की जीत की कोई स्पष्ट संभावना नहीं थी, लेकिन नतीजे चौंकाने वाले थे। राहुल गांधी से लेकर अन्य सभी का दृढ़ मत है कि ईवीएम में घोटाला हुआ था। मध्य प्रदेश में इस्तेमाल की गई वही ‘ईवीएम’ महाराष्ट्र में लाई जा रही हैं। यह मामला गंभीर है। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में ईवीएम और मतदाता सूची में गड़बड़ी हुई थी। शाम के आखिरी दो घंटों में अचानक साठ लाख मतदाताओं की संख्या बढ़ गई और ये सभी वोट अकेले भाजपा के पलड़े में गए। शाम को मतदान केंद्रों पर कोई कतार नहीं थी। फिर भी न्यायपालिका में भाजपा के प्रवक्ता साठ लाख मतदाताओं की वृद्धि के गंभीर मामले को नहीं समझेंगे। इन सभी पृष्ठभूमि में फडणवीस सरकार स्थानीय निकाय चुनाव कराने जा रही है। पिछले तीन वर्षों में मुंबई, ठाणे, पुणे, नासिक सहित २७ महानगरपालिकाओं में प्रशासकों ने वैâसे लूट मचाई, यह वसई-विरार नगरपालिका आयुक्त अनिल पवार के मामले में देखा जा सकता है। अहिल्यानगर जैसी महानगरपालिका में ३००-४०० करोड़ की ‘सड़कें’ कागजों पर बन गईं। शहर में वे दिखाई नहीं देतीं। नगरीय विकास मंत्री ने विभिन्न तरीकों से हजारों करोड़ लूट लिए। उसी लूट के पैसे से उन्होंने दूसरी पार्टियों के जनप्रतिनिधियों को खरीदा और उसी पैसे से चुनाव लड़ेंगे। अगर कोई अदालत में याचिका लेकर जाता है, तो भाजपा ने उसे खारिज करने के लिए मुंबई से लेकर दिल्ली तक की अदालतों में अपने प्रवक्ताओं को बिठाकर रखा है। धन्य है हमारा लोकतंत्र और धन्य है स्वतंत्र चुनाव प्रणाली!
