हमारी बारी

दुआओं में जब सबका ज़िक्र हुआ
तो खुदा मुझे भूल गया
मेरी मिन्नतें अधूरी रह गई
मेरा आश्वासन बिखरता गया
मेरी कामनाएं छूटती गई
उस मोड़ पर आकर खड़ी हो गई
जहां अंधेरों का घेराव था
जमीं में सिलन थी आसमां काला था
न कोई तारा न कोई चांद हमारा था
सूरज की किरणें भी फीकी थी
काले बादलों का ठहराव ज्यादा था
समय का पता नही कब आता कब जाता था
दुःख सुख का किनारा एक समान था
बारिश गिरे न गिरे प्यासा सारा आलम था
कोई महसूसियत, एहसास नही जागता था
मेरी भावनाओं की कद्र नही की
मेरे अरमानों को कैद किया गया
मेरी इच्छाएं दरी की दरी रह गई
दलदल भरे रस्ते में मुझे डाला
क्यों नही बरसीं ईश्वर की रहमाई
सुन पड गई सारी खुदाई
जंग लग गया जब हमारी बारी आई

अन्नपूर्णा कौल, नोएडा

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