मुख्यपृष्ठनए समाचारशिक्षा के नाम पर लूट... निजी स्कूलों की पढ़ाई १० गुनी महंगी!

शिक्षा के नाम पर लूट… निजी स्कूलों की पढ़ाई १० गुनी महंगी!

-एनएसएस की सर्वे रिपोर्ट का खुलासा

-फीस, किताबें, यूनिफॉर्म, बस सभी महंगे

सामना संवाददाता / मुंबई

शिक्षा के नाम पर अभिभावकों की जेब पर डाका डाला जा रहा है। सरकारी स्कूलों की तुलना में निजी स्कूलों की पढ़ाई दस गुना महंगी हो चुकी है। फीस से लेकर किताबें, यूनिफॉर्म और बस सेवा तक हर चीज के आसमान छूते दामों ने माता-पिता की कमर तोड़ दी है। यह चौंकाने वाला सच हाल ही में राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण यानी एनएसएस की सर्वे रिपोर्ट से उजागर हुआ है। कुल मिलाकर यह स्थिति गरीब और मध्यम वर्ग के परिवारों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को एक असंभव सपना बना रही है।
उल्लेखनीय है कि शिक्षा सभी का मूलभूत अधिकार है। शिक्षा के बिना कोई विकल्प नहीं है। शिक्षा में सब कुछ बदलने की ताकत है, लेकिन वर्तमान में शिक्षा का खर्च अत्यधिक महंगा हो गया है। देश के हर राज्य में शिक्षा अब केवल मूलभूत अधिकार नहीं रही, बल्कि खर्च के मामले में प्रतिस्पर्धा बन गई है। शिक्षा का खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है। हाल ही में एनएसएस ने सर्वेक्षण किया। इसमें बताया गया है कि शिक्षा के नाम पर चल रही लूट ने माता-पिता की सांसें रोक दी हैं। इस सर्वेक्षण में देश के ५२,०५८ परिवारों और ५७,७४२ विद्यार्थियों से जानकारी एकत्र की गई। इसमें देशभर के कुल विद्यार्थियों में से ५५.९ फीसदी विद्यार्थी सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं, जिसमें ग्रामीण क्षेत्र के विद्यार्थी अधिक हैं। वर्तमान वित्तीय वर्ष में सरकारी स्कूलों में प्रत्येक विद्यार्थी पर औसत खर्च २,८६३ रुपए है। बिना अनुदान वाले स्कूलों में यह खर्च २५,००२ रुपए है, जो अत्यधिक है। सभी स्कूलों में सबसे अधिक खर्च पाठ्यक्रम शुल्क पर हो रहा है, जो ७,१११ रुपए है। पाठ्य पुस्तक और स्टेशनरी पर २,००२ रुपए खर्च हुआ। शहरी क्षेत्रों में लोग इसके लिए अधिक पैसे दे रहे हैं। पाठ्यक्रम शुल्क पर औसत खर्च १५,१४३ रुपए है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यही खर्च ३,९७९ रुपए है।
जेब पर भारी दबाव
इस व्यापक मॉड्यूलर शिक्षा सर्वेक्षण के अनुसार, महाराष्ट्र में शिक्षा का खर्च लगातार बढ़ रहा है। सरकारी स्कूल में बच्चे को भेजने पर वार्षिक खर्च केवल ३,००० रुपए है, वहीं बिना अनुदान वाले निजी स्कूल में यही खर्च २८,७४१ रुपए तक पहुंच जाता है। इससे अभिभावकों की जेब पर भारी दबाव पड़ रहा है।

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