धनुर्धर
कहते हैं ऑल इज फेयर इन लव एंड वॉर। यानी जंग और मोहब्बत में सब जायज है। इसीलिए जब बहुत सारे नाजायज काम करने हों तो चतुर सुजान लोग पहले ही जंग का एलान कर देते हैं। वैसे तो मोहब्बत की भी घोषणा कर सकते हैं, लेकिन उसकी अपनी सीमाएं होती हैं। अव्वल तो मोहब्बत के लिए एक अदद महबूब/महबूबा चाहिए, जो जरूरी नहीं कि हर उम्र, मौका और हालात में मिल ही जाए। दूसरी बात कि अगर किसी को महबूब/महबूबा घोषित कर दिया जाए तो उसे बहुत सारे अघोषित अधिकार अपने आप मिल जाते हैं। पता नहीं वह किस मौके पर उन अधिकारों का वैâसा इस्तेमाल करने लग जाए। कहा भी गया है, इश्क में रिस्क होता है।
प्यार नहीं, नफरत
जंग के साथ उस तरह के खतरे नहीं होते। उसमें प्यार की जरूरत नहीं होती। नफरत से ही काम चल जाता है। एक बार जंग का एलान कर दिया आपने फिर अपने उस कथित दुश्मन के साथ घटिया से घटिया बर्ताव करने का लाइसेंस आपके हाथ में आ जाता है और बात अगर सियासत की हो, चुनाव की हो तब तो किसी तरह के शरम-लिहाज की वैसे भी जरूरत नहीं होती। पश्चिम बंगाल का उदाहरण लेटेस्ट है।
पुरानी चाहत
पश्चिम बंगाल के दुर्ग पर कब्जे की चाहत तो उनमें बहुत पहले से थी, लेकिन हालात ऐसे नहीं थे जिनमें उस चाहत के पूरे होने की कोई संभावना भी नजर आए। यह संभावना बननी शुरू हुई तब जब दिल्ली की सत्ता हाथ में आई और अश्वमेध यज्ञ के जरिए पार्टी के साम्राज्य विस्तार का अभियान शुरू हुआ। लेकिन पार्टी के अश्वमेध यज्ञ का जो घोड़ा छोटे-मोटे अपवादों के साथ देशभर में निर्बाध घूमता रहा, वह पश्चिम बंगाल की सरहद के आसपास जाते ही हिनहिना कर ठिठक जाता। वहां सिंहनी की दहाड़ पहले ही उसका रास्ता रोक लेती।
तैयारी पूरी थी
एक नहीं, दो-दो बार ऐसा हो चुका था। सो इस बार भाई लोगों ने ठान लिया था कि किसी शर्म-लिहाज-संकोच को रास्ते में नहीं आने देना है। जंग इस अभियान को मान ही चुके थे, सो जायज-नाजायज की वैसे भी चिंता नहीं थी। तय था कि पश्चिम बंगाल के दुर्ग पर तो कब्जा करना ही है, सिंहनी का खौफ भी लोगों के दिलों से हमेशा के लिए खत्म कर देना है। तमाम एजेंसियां जो उचित-अनुचित के सवालों की जांच करने बीच में आ जाया करती हैं, उन सबको तैयारी के क्रम में ही ‘ठीक’ किया जा चुका था।
सबकुछ मुमकिन
मैदान खाली था। वोटर लिस्ट में जहां जरूरी हुआ नाम काटे गए, जहां आवश्यकता हुई नाम जोड़े गए, लेकिन बड़ी बात देखनेवाली यह है कि आखिर लक्ष्य हासिल कर लिया गया। इंसान हो या पार्टी, अगर कोई ठान ले तो कुछ भी नामुमकिन नहीं। और जब मोदी हैं तो वैसे भी मुमकिन है, ज्ञानीजन कह गए हैं। सो पश्चिम बंगाल में सब कुछ मुमकिन हो गया। चुनावी बाजी को पलटते हुए सत्तारूढ़ दल को अल्पमत में समेट देना तो सिर्फ एक बात है। उससे बड़ी बात यह है कि जो विधायक जीत कर आए, उनसे भी उसको वंचित कर दिया गया और अब राज्य में मिली ताकत के बल पर केंद्र की राजनीति को प्रभावित करने की उसकी क्षमता पर भी कुठाराघात किया जा रहा है।
कौन दुश्मन, कौन दोस्त
ऐसा समां बांध दिया गया है कि सिंहनी को समझ ही न आए कौन दोस्त है और कौन दुश्मन। जो भी भरोसेमंद मित्र बने नजर आते थे, एक-एक करके सबने तलवारें खींच लीं। आखिरी दांव चला उसने जिस पर पार्टी का ‘कल्याण’ करने की जिम्मेदारी थी। दूसरी तरफ जिनका नाम ही ‘शत्रु’ है उन्होंने बयान दिया कि वह दोस्ती में फिलहाल दगाबाजी नहीं करेंगे। यहां भी फिलहाल शब्द बड़ी मारक भूमिका में है।
लाउड एंड क्लीयर
मैसेज कुल मिलाकर एक ही है। सॉरी दो हैं या चलिए फाइनली तीन में समेट देते हैं। एक तो यह कि बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाएगी, बस घंटों या दिनों की बात है, जब तक कसाई हाथ में छुरा नहीं पकड़ता। दूसरा या कि गब्बर के ताप से तुम्हें एक ही आदमी बचा सका है और वह है खुद गब्बर। तीसरा मैसेज और भी लाउड एंड क्लीयर है- हमसे लड़ने की हिम्मत तो जुटा लोगे, हमारे जैसा कमीना कहां से लाओगे?
