पाली। जिले के बेड़ा नदी में गणपति विसर्जन के दौरान रविवार को एक बड़ा हादसा हो गया। भीड़ के बीच पैर फिसलने से एक युवक नदी में बह गया और उसकी डूबने से मौत हो गई। सूचना मिलते ही एसडीआरएफ की टीम ने मौके पर रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया और आज दोपहर करीब 2 बजे युवक का शव नदी से बाहर निकालकर मोर्चरी में रखवाया गया। मृतक युवक की पहचान दीवानसिंह के रूप में हुई है, जो घर का अकेला कमाने वाला था। अचानक हुए इस हादसे ने पूरे परिवार को गहरे शोक में डुबो दिया है, परिजन रो-रोकर बेहाल हैं।
लेकिन सवाल सिर्फ इतना नहीं कि यह हादसा कैसे हुआ — सवाल यह भी हैं कि आखिर कब तक धार्मिक आयोजनों में सुरक्षा और समझदारी को आस्था के नीचे दबा दिया जाएगा? क्या सचमुच आस्था इंसानों की जिंदगी से बड़ी है? क्या वह आस्था, जो अंधविश्वासों की चरम सीमाओं में जाकर किसी के घर का चिराग बुझा दे, सही दिशा दिखाती है?
संस्कारों की बातें खूब होती हैं, लेकिन ये संस्कार आते कहाँ से हैं? माता-पिता से ही, न? और अगर माता-पिता खुद अंधविश्वास के शिकार हैं, तो बच्चों को मिलते संस्कार भी समझ की जगह भीड़ के साथ बह जाने वाले ही होंगे। दुखद यह हैं कि एक ओर हम विज्ञान, तकनीक और विकास की बात करते हैं, दूसरी ओर उसी समाज में जानलेवा लापरवाहियां “परंपरा” के नाम पर ढकी जाती हैं। यह हादसा सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, यह समाज के सोचने का समय है कि हमारी आस्था, हमारे संस्कार, हमारी जिम्मेदारियां, आखिर किस दिशा में जा रही हैं।
