-जिला, उपजिला, ग्रामीण और ट्रॉमा अस्पतालों में कर्मचारियों की है भारी कमी
-स्वास्थ्य सेवा सुधार के नाम पर मात्र `१९२ करोड़ मंजूर
सामना संवाददाता / मुंबई
महाराष्ट्र के जिला, उपजिला, ग्रामीण, ट्रॉमा और महिला अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवाएं चरमरा रही हैं। अस्पतालों में बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं। लोग इलाज के लिए भटक रहे हैं, वहीं सरकारी आंकड़ों के अनुसार, कर्मचारियों की संख्या कई अस्पतालों में आधी भी नहीं है। इसी बीच स्वास्थ्य सुधार के नाम पर १९२ करोड़ रुपए का फंड मंजूर किया गया है, जो मुख्य रूप से दवाइयों, कंज्यूमेबल्स, प्रयोगशाला सामग्रियों और सर्जिकल उपकरणों की खरीद पर खर्च किया जाएगा।
अब सवाल यह है कि यह रकम जनता की सेवा में जाएगी या महायुति सरकार के ठेकेदारों और बाहरी एजेंसियों की जेबें भरने के लिए इस्तेमाल होगी। विशेषज्ञ और मरीजों का कहना है कि सरकार केवल दिखावे और रिपोर्ट कार्ड सुधारने में लगी हुई है, जबकि असली समस्याएं यथावत हैं। महाराष्ट्र में महायुति सरकार ने स्वास्थ्य सेवा सुधार के नाम पर १९२.१४ करोड़ रुपए की भारी निधि मंजूर की है। सरकार ने इस राशि का वितरण बीम्स प्रणाली के माध्यम से करने की मंजूरी दी है। वित्त विभाग ने स्पष्ट किया कि वार्षिक निधि का केवल ६० फीसदी प्रथम नौ महीनों में खर्च किया जा सकता है यानी पैसा तो उपलब्ध है, लेकिन प्रशासनिक जटिलताओं और प्रक्रियाओं के कारण यह असली लाभ मरीजों तक नहीं पहुंचने वाला है।
आदेश और शर्तें सिर्फ कागजों तक
शासनादेश में स्पष्ट किया गया है कि निधि केवल निर्दिष्ट उद्देश्य के लिए खर्च की जाएगी। साथ ही खर्च का विवरण और प्रमाणपत्र समय पर सरकार के समक्ष प्रस्तुत करना अनिवार्य है। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्रक्रिया केवल कागजी लड़ाई है और वास्तविक फायदा मरीजों तक पहुंचने में महीनों लग सकते हैं।
ठेकेदारों के हवाले राशि
नाम न छापने पर अस्पताल में सेवारत एक कर्मचारी ने कहा कि महायुति सरकार स्वास्थ्य सुधार के नाम पर फंड की लाखों की राशि को ठेकेदारों और बाहरी एजेंसियों के हवाले कर रही है, जबकि असली जरूरतमंद मरीजों तक दवाइयां, उपकरण और सुविधाएं नहीं पहुंच पा रही हैं।
अस्पतालों की दुर्दशा और कर्मचारियों की त्रासदी
कर्मचारियों का कहना है कि सरकारी अस्पतालों में कर्मियों और संसाधनों की भारी कमी के बावजूद सरकार केवल आंकड़ों और डिजिटल सिस्टम की आड़ में काम कर रही है। खर्च का विवरण और उपयोगिता प्रमाणपत्र की जिम्मेदारी प्राधिकरण और आयुक्तालय पर है। लेकिन जमीन पर दवाइयों और उपकरणों की कमी जारी है।
