-वर्षों से पुनर्वास के लिए कर रहे हैं संघर्ष
सामना संवाददाता / मुंबई
जेएनपीए बंदरगाह के निर्माण के कारण पूरी तरह भूमिहीन हो चुके हनुमान कोलीवाडा के निवासियों को पुनर्वास के लिए जमीन देने से केंद्र सरकार ने इनकार कर दिया है। केंद्रीय बंदरगाह, जहाजरानी और जल परिवहन मंत्रालय के सचिव आई. जी. बालिश ने भूखंड उपलब्ध कराने के बजाय जेएनपीए प्रशासन को इस गांव के २५६ परिवारों का क्लस्टर में भवन बनाकर पुनर्वास करने के निर्देश दिए हैं। इस बात से वहां के नागरिकों में नाराजगी है और उनका कहना है कि सरकार ने उन्हें धोखा दिया है।
बताया जाता है कि जेएनपीए परियोजना प्रभावित लोग पिछले ४० वर्षों से पुनर्वास के लिए संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन उनके साथ धोखाधड़ी का सिलसिला अभी तक थमा नहीं है। सरकार द्वारा फिर से धोखा दिए जाने से ग्रामीणों में आक्रोश की लहर दौड़ गई है।
बता दें कि जेएनपीए बंदरगाह के निर्माण के लिए शेवा और हनुमान कोलीवाडा दो गांवों को विस्थापित किया गया है। इनमें से कोलीवाड़ा गांव के विस्थापित निवासियों को जेएनपीए ने बोरीपाखड़ी क्षेत्र में १७ हेक्टेयर भूमि के बजाय केवल दो हेक्टेयर भूमि पर पुनर्वासित किया है। इसी प्रकार हनुमान कोलीवाडा गांव, जिसमें २५६ घर हैं, वे सभी घर भूस्खलन में मिट्टी में धंस गए हैं। परिणामस्वरूप पहले से ही तंग और असुविधाजनक जगहों पर रह रहे ग्रामीण बाढ़ से और भी तबाह हो गए हैं। इसके कारण कई परिवार विभिन्न अस्थायी शिविरों में रहने चले गए हैं।
५५० बैठकें, परिणाम शून्य
पिछले ४० वर्षों में इस संघर्ष में ५५० बैठकें और चर्चाएं हो चुकी हैं। विरोध प्रदर्शनों और मोर्चा के बाद भी आश्वासनों के अलावा कुछ हासिल नहीं हुआ है। इसके बाद हनुमान कोलीवाड़ा के गुस्साए ग्रामीणों ने पुनर्वास के लिए जेएनपीए के समुद्री चैनल को बंद कर दिया और मालवाहक जहाजों को भी रोक दिया था।
जेएनपीए भी असहाय
इसके बाद जेएनपीए अध्यक्ष उन्मेष वाघ ने हनुमान कोलीवाडा के ग्रामीणों को पुनर्वास हेतु १०.१६ हेक्टेयर भूमि उपलब्ध कराने का प्रस्ताव केंद्रीय बंदरगाह, जहाजरानी एवं जल परिवहन मंत्रालय को स्वीकृति हेतु भेजा था। परंतु केंद्र ने जेएनपीए द्वारा पुनर्वास हेतु भेजे गए प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया है। केंद्र सरकार की अस्वीकृति ने जेएनपीए प्रशासन को भी असहाय बना दिया है।
