मुख्यपृष्ठनए समाचारश्राद्ध और तर्पण क्या है ?

श्राद्ध और तर्पण क्या है ?

-आचार्य करुणेश जी महराज
(कथा व्यास)

बहुत लोग यह प्रश्न करते हैं कि श्राद्ध और तर्पण क्या है, क्यूं करना चाहिए?
मित्रों, हमारे धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि सत्य और श्रद्धा से किए गए कर्म श्राद्ध और जिस कर्म से माता, पिता और आचार्य तृप्त हो वह तर्पण है। वेदों में श्राद्ध को पितृयज्ञ कहा गया है। यह श्राद्ध-तर्पण हमारे पूर्वजों, माता, पिता और आचार्य के प्रति सम्मान का भाव है। यह पितृयज्ञ जब सम्पन्न होता है तो पितरों के आशीर्वाद से सन्तानोत्पत्ति और सन्तान की सही शिक्षा-दीक्षा प्राप्त होती है। इसी से ‘पितृ ऋण’ से भी मुक्ति मिलती है।
वेदानुसार यज्ञ पांच प्रकार के होते हैं- (1) ब्रह्म यज्ञ (2) देव यज्ञ (3) पितृयज्ञ (4) वैश्वदेव यज्ञ (5) अतिथि यज्ञ। उक्त 5 यज्ञों को पुराणों और अन्य ग्रंथों में विस्तार से बताया गया है। उक्त 5 यज्ञ में से ही एक यज्ञ है पितृयज्ञ। इसे पुराण में श्राद्ध कर्म की संज्ञा दी गई है।
पितृयज्ञ या श्राद्धकर्म के लिए अश्विन माह का कृष्ण पक्ष ही नियुक्त किया गया है। सूर्य के कन्या राशि में रहते समय आश्विन कृष्ण पक्ष पितर पक्ष कहलाता है, जो इस पक्ष तथा देहत्याग की तिथि पर अपने पितरों का श्राद्ध करता है उस श्राद्ध से पितर तृप्त हो जाते हैं। कन्या राशि में सूर्य रहने पर भी जब श्राद्ध नहीं होता तो पितर तुला राशि के सूर्य तक पूरे कार्तिक मास में श्राद्ध का इंतजार करते हैं और तब भी न हो तो सूर्य देव के वृश्चिक राशि पर आने पर पितर निराश होकर अपने स्थान पर लौट जाते हैं। पितरों के आशीर्वाद से सुख शांति की प्राप्ति होती है। हम सभी को अपने पितरों के निमित्त श्राद्ध तर्पण अवश्य करना चाहिए।

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