तिलिस्मी निशा

निशा का उन्माद करता अचंभित
रहस्यमयी यवनिका छा जाती
मयंक की पतली सी फांक नभ पर टंक जाती
टिमटिमाते तारों की झालर इतराने लगती
छवि हरित विपिन की
तिमिर रात्रि में खो जाती
बहुरंगी फुलवारी हो जाती नयनों से ओझल
झुरमुटों की ओट से निशाचरों की आंखें चमकतीं
तलैया में पड़ी छवि शशि की रहस्य को गहरा देती
चकोर के नयनों में किरण आशा की झलकी
हुई मुदित शतदल की कोमल पंखुड़ियां
भ्रमर हो गए बंधित आसक्ति में पंकज की
रुपहली ज्योत्स्ना चांदनी की छा गई कण-कण में
हो मुखरित कुमुदुनी लहक-लहक लरजी
मंडूक झींगुर हो निशंक अपने गृह से निकले
लक्ष्मी वाहन चुगद ने ग्रीवा घुमा
पवन भर पंखों में लम्बी उड़ान भरी
झूम उठीं वृक्ष वक्ष से लिपटीं वल्लरियां
जादुई महक रातरानी ने छितराई
गहन तिमिर में लगा बज उठी पैजनिया
तिलिस्मी निशा नगरी का इंद्रजाल फैल गया
मानो विभावरी ने काली चादर की ओढ़नी ओढ़ ली बेला है।
-बेला विरदी

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