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भीषण गर्मी से राहत के लिए काशी में अनोखा अनुष्ठान…राग ‘मेघ’ से की गई इंद्रदेव को रिझाने की कोशिश

उमेश गुप्ता / वाराणसी

ज्येष्ठ-आषाढ़ की तपती दुपहरी और प्रचंड गर्मी से बेहाल काशीवासियों को राहत दिलाने के लिए धर्मनगरी में एक बेहद अनूठा और सांस्कृतिक अनुष्ठान देखने को मिला। जहां एक ओर काशी के गंगा तटों पर रोज़ाना सुबह-शाम वैदिक मंत्रोच्चार, पूजा-पाठ और पवित्र स्नान का दौर चल रहा है, वहीं दूसरी ओर बादलों के देवता भगवान इंद्र को प्रसन्न करने के लिए संगीत के सुरों की ‘कवायद’ शुरू हो गई है। मान्यता है कि जब इंसान की प्रार्थनाओं में सुरों का तालमेल जुड़ जाता है, तो देवता भी पिघल जाते हैं। इसी आस के साथ सुर-सरिता के माध्यम से काशी को झुलसाने वाली गर्मी से निजात दिलाने की प्रार्थना की जा रही है।
​काशी के ऐतिहासिक रीवा घाट पर मंगलवार की सुबह काशी विश्वनाथ मंदिर के शहनाई वादक पंडित महेंद्र प्रसन्ना और उनकी पूरी टीम ने गंगा पूजन और वंदन के पश्चात् अनुष्ठान की शुरुआत मां गंगा के विधि-विधान से पूजन-अर्चन के साथ हुई। कलाकारों ने मां गंगा को पारंपरिक ‘पियरी’ (पीला वस्त्र) अर्पित कर उनका वंदन किया और लोक-कल्याण की कामना की। ​राग ‘मेघ’ से बादलों को आमंत्रण – वैदिक काल से ही माना जाता रहा है कि शास्त्रीय संगीत के कुछ रागों में प्रकृति को बदलने की शक्ति होती है। इसी परंपरा का निर्वहन करते हुए पंडित महेंद्र प्रसन्ना ने अपनी शहनाई पर राग मेघ को साधा। शहनाई से निकले इस राग के गंभीर और मधुर स्वरों ने घाट पर मौजूद हर श्रद्धालु को मंत्रमुग्ध कर दिया। ऐसा लगा मानो सुरों के माध्यम से आसमान में उमड़ते-घुमड़ते बादलों को सीधे काशी आने का निमंत्रण दिया जा रहा हो।
​राग मेघ के शास्त्रीय वादन के बाद, टीम ने क्लासिकल संगीत और पारंपरिक भजनों की झड़ी लगा दी। शहनाई की जादुई धुन पर जब लोक-भावनाओं को समेटे हुए भजन गूंजे, तो घाट का पूरा माहौल भक्तिमय हो उठा।
इस आयोजन में मुख्य शहनाई वादन पंडित महेंद्र प्रसन्ना के साथ ही गणेश प्रसाद, सहयोगी शहनाई वादक केदारनाथ मिश्र, दुक्कड़ मालचंद स्वर, प्रभात प्रसन्ना शामिल थे।

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