मुख्यपृष्ठस्तंभलोकतंत्र के सच्चे पहरेदार ने कहा, अलविदा

लोकतंत्र के सच्चे पहरेदार ने कहा, अलविदा

डॉ. रमेश ठाकुर

अपने हिस्से की सामाजिक जिम्मेदारी को ‘एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक’ (एडीआर) के मुखिया जगदीप एस. छोकर बखूबी निभा कर सभी को अलविदा कह गए। हालांकि, अभी उनके एजेंडे में बहुत कुछ किया जाना बाकी था। बिहार एसआईआर की लड़ाई उनकी सुप्रीम कोर्ट में लंबित थी। लेकिन नियंति को शायद कुछ और ही मंजूर था? उनकी यात्रा यहीं तक की थी? चुनावी प्रक्रियाओं में बदलाव का उन्हें सदैव पैरोकार माना गया। चुनाव सुधारक के अलावा वह लोकतांत्रिक व्यवस्था को डिटॉक्स करने वाले सजग प्रहरी भी रहे। 26 बरस पहले उन्होंने एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स यानी ‘एडीआर’ नाम की संस्था को खड़ा करके समूचे देश के सफेदपोशों से सीधा पंगा लिया। चुनाव लड़ने वाले सभी नेताओं की कुंडली उन्होंने खोदनी शुरू की। यही से वह सभी के निशाने पर आ गए। किन नेताओं पर कितने मुकदमें हैं और कितनी चल-अचल संपत्ति हैं। जैसी तमाम हिंडन जानकारियों को उन्होंने एकत्र करके बम की तरह फोड़ते थे। खुलासा ऐसे वक्त करते थे, जब आरोपी नेता चुनावों में छलांग लगाने की तैयारियों करते होते थे। जगदीप छोकर अनगिनत नेताओं के आंखों में खटकने लगे थे। कई मर्तबा उन्हें धमकियां भी मिली, घूस का ऑफर भी मिला। किसी की उन्होंने परवाह नहीं की? अपने काम को बेखौफ जदा होकर अंजाम देते गए। वह औरों से लीक से हटकर काम करने के लिए जाने जाते थे।
सूचनाओं के मुताबिक, छोकर का शुक्रवार तड़के सीने में दर्द उठना शुरू हुआ, उसके बाद हृदय गति के रुकने से निधन हुआ। उनके निधन की खबर जैसे ही बाहर आई। लोग स्तब्ध रह गए। चुनाव सुधार के आंख नाक हुआ करते थे, तभी उनको समाज का प्रहरी कहा जाता था। चुनावी अव्यवस्थाओं पर अंकुश लगाने को लेकर पैनी निगाहें रखते थे। वह जितने कड़क मिजाज थे, उतने ही अंदर से नरम भी? अपने बनाए उसूलों से उन्होंने कभी समझौता नहीं किया। उनके भीतर गुणों का भंडार था। लेखक, पत्रकार, बुद्धिजीवी, शिक्षक, मोटीवेटर के अलावा न जाने कितनी विधाएं उनमें समाई हुई थीं। वह भारतीय प्रबंधन संस्थान, अहमदाबाद में प्रोफेसर, डीन और प्रभारी निदेशक भी रहे। रेलवे में मैकेनिकल इंजीनियर के पद पर भी आसीन रहे। 1999 में जब उन्होंने एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स नाम की संस्था को जन्म दिया, तो इसी में रम गए। उसके बाद उन्होंने बाकी के सभी काम छोड़ दिए। गुजरे 20 वर्षों से वह भारतीय चुनाव और राजनीतिक सुधार के क्षेत्रों में ही संलिप्त रहे।
देश के इस चितेरे इंसान को सामाजिक कार्यों की प्रेरणा उनके एक सहपाठी से मिली। छोकर सार्वजनिक मामलों के समर्पित निस्वार्थ योद्वा हुआ करते थे। गरीब, मजलूम और बेसहारा लोगों की वह बुलंद आवाज थे। ऐसे लोगों का जाने का मतलब, होता है अनगिनत लोगों की निजी क्षति का होना। वह नागरिक समाज संगठन आजीविका ब्यूरो के भी संस्थापक अध्यक्ष रहे। ये संगठन भारत में आंतरिक प्रवास से संबंधित मुद्दों पर काम करता है। जागरूक नागरिक के अलावा वह प्रसिद्व वकील और पक्षी प्रेमी के रूप में जाने गए। शुक्रवार तडके करीब साढे तीन बजे दिल का दौरा पड़ना शुरू था, उसके तुरंत बाद ही अंतिम सांस ले ली। कुछ दिन पूर्व बाथरूम में गिर पडे थे। तब कंधे में फ्रैक्चर हो गया था, जिसका ईलाज चल रहा था। इसी बीच उनके फेफड़ों में संक्रमण में फैल गया था, तभी से उनका शरीर कमजोर होना आरंभ हुआ।
प्रो. छोकर के काम करने का तरीका औरों से अलहदा होता था। ताउम्र वह राजनेताओं का सिरदर्द बनें रहे। कईयों की सदस्यताएं भंग कराई और कईयों को चुनाव लड़ने से रूकवाया। वह सुप्रीम कोर्ट से लेकर हाई कोर्ट व विभिन्न अदालतों मेंजनहित याचिका दायर करते थे। और चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों की आपराधिक, वित्तीय और शैक्षिक पृष्ठभूमि का खुलासा कर उन्हें चुनाव नहीं लड़ने की गुजारिश कोर्ट में करते थे। उनका काम बेशक नेताओं को नापंसद रहा हों, लेकिन देशवासी सराहते थे। सभी वाकिफ हैं कि उनकी ही एक याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने साल 2002 और उसके बाद 2003 में, चुनाव लड़ने वाले सभी उम्मीदवारों के लिए चुनाव आयोग के समक्ष हलफनामा दायर करके चुनाव से पहले अपनी आपराधिक, वित्तीय और शैक्षिक पृष्ठभूमि का खुलासा करना अनिवार्य हुआ था। कोर्ट के इस निर्णय के बाद उनकी संस्था की लोकप्रियता दिनों दिन बढ़ गई थी।
गौरतलब है टीएन शेषन के बाद अगर भारतीय लोकतंत्र में चुनावी व्यवस्था में जागरूकता के लिए किसी ने काम बड़े स्तर पर काम किया, तो वो नाम प्रो. जगदीप छोकर का है। इसलिए ही नहीं कि उन्होंने एडीआर की स्थापना की, बल्कि इसलिए कि उन्होंने लगातार दो दशकों से अधिक समय तक भारतीय जनमानस को झकझोरा और बताया कि भारतीय राजनीति में हमारे जनप्रतिनिधि काफी बड़ी संख्या में चोर-उचक्के, भ्रष्टाचारी हैं और यह काम उन्होंने और उनकी टीम ने लगातार किया, हमारे मन मस्तिष्क पर लगातार हथौड़ा चलाया। एक-दो बार नहीं, अनेक बार सर्वोच्च अदालत को भी बाध्य किया कि ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई हो। यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि वह अपने पीछे भारत की लोकतांत्रिक यात्रा से गहराई से जुड़ी एक विरासत छोड़ गए। उन्होंने चुनावी नेताओं के आपराधिक और वित्तीय रिकॉर्ड को ही नहीं उजागर किया, बल्कि कई बार पारदर्शिता के नए आयाम बताए। भारतीय लोकतंत्र में ऐसे कम ही लोग होंगे, जिन्होंने पूरे तन-मन से लोकतंत्र के पौधे को पुष्पित-पल्लवित किया। देश के असली और बड़े सम्मान के वो हकदार हैं। केंद्र सरकार को भी इसमें आगे आना चाहिए।

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