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श्राद्ध कितने प्रकार के होते हैं?

आचार्य करुणेश महराज
(कथा व्यास)

इस समय श्राद्ध पक्ष चल रहा है, हमारे धर्मशास्त्रों में वर्णन आता है कि पितृ सदैव हमारे आपके आस-पास रहते हैं। मृत्यु के पश्चात हमारा और मृत आत्मा का संबंध-विच्छेद केवल दैहिक स्तर पर होता है, आत्मिक स्तर पर नहीं। जिनकी अकाल मृत्यु होती है, उनकी आत्मा अपनी निर्धारित आयु तक भटकती रहती है।
हमारे पूर्वजों को, पितरों को जब मृत्यु उपरांत भी शांति नहीं मिलती और वे इसी लोक में भटकते रहते हैं, तो हमें पितृ दोष लगता है। शास्त्रों में कहा गया है कि पितृ दोष के कुप्रभाव से बचने के लिए अशांत जीवन का उपाय श्राद्ध है तथा इससे बचने के लिए विभिन्न उपाय किए जाते हैं, जिनमें त्रिपिंडी श्राद्ध, पितृ तर्पण व तीर्थ यात्राएं आदि तो हैं ही, साथ ही विभिन्न प्रकार की साधनाएं एवं प्रयोग किए जाते हैं, जिनके संपन्न करने से पितृ दोष से मुक्ति मिलती है।
श्राद्ध बारह प्रकार के होते हैं, जो इस प्रकार हैं-
नित्य श्राद्ध
यह श्राद्ध नियमित रूप से प्रतिदिन किया जाता है। भोजन के पहले गौ ग्रास निकलना नित्य श्राद्ध माना गया है। इससे पितरों की तृप्ति होती है और घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
काम्य श्राद्ध
काम्य श्राद्ध किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए किया जाता है। उदाहरण के लिए किसी की लंबी उम्र, पुत्र प्राप्ति या जीवन में सुख-संपत्ति की प्राप्ति के लिए। इसे विशेष मनोकामना की पूर्ति के लिए किया जाता है।
नैमित्तिक श्राद्ध
पितृ पक्ष में किया जाने वाला श्राद्ध ‘नैमित्तिक श्राद्ध’ कहलाता है।
वृद्धि श्राद्ध
मुंडन, विवाह, उपनयन आदि के अवसर पर किया जाने वाला श्राद्ध ‘वृद्धि श्राद्ध’ कहलाता है। इसे नान्दीमुख भी कहते हैं।
सपिंडीकरण श्राद्ध
यह श्राद्ध मृत्यु के 12वें दिन या कुछ स्थानों पर 13वें दिन किया जाता है। इस श्राद्ध से पितरों का सम्मिलन पूर्वजों की पिंडियों में होता है। इसे करने से पितरों को मोक्ष प्राप्ति में सहायता मिलती है।
पार्वण श्राद्ध
पार्वण श्राद्ध अमावस्या, पूर्णिमा या संक्रांति जैसे विशेष दिनों में किया जाता है। इसे पारिवारिक श्राद्ध भी कहा जाता है, जिसमें सभी पितरों के लिए तर्पण और पूजा की जाती है।
गोष्ठी श्राद्ध
गौशाला में वंशवृद्धि के लिए किया जाने वाला श्राद्ध ‘गोष्ठी श्राद्ध’ कहलाता है।
शुद्धि श्राद्ध
यह श्राद्ध पवित्रता और शुद्धि के लिए किया जाता है। इसे तब किया जाता है जब किसी अशुद्ध या अपवित्र स्थिति के बाद शुद्धिकरण की आवश्यकता होती है। यह घर या परिवार के शुद्धिकरण के लिए महत्वपूर्ण होता है।
कर्मांग श्राद्ध
गर्भाधान,सीमंत,पुंसवन संस्कार के समय किया जाने वाला श्राद्ध कर्म ‘कर्मांग श्राद्ध’ कहलाता है।
दैविक श्राद्ध
सप्तमी तिथियों में हविष्यान्न से देवताओं के लिए किया जाने वाला श्राद्ध ‘दैविक श्राद्ध’ माना गया है।
यात्रार्थ श्राद्ध
तीर्थ यात्रा पर जाने से पहले और वहां पर किए जाने वाले श्राद्ध को ‘यात्रार्थ श्राद्ध’ कहा जाता है।
पुष्टयर्थ श्राद्ध
अपने वंश और व्यापार आदि की वृद्धि के लिए किया जाने वाला श्राद्ध ‘पुष्टयर्थ श्राद्ध’ की श्रेणी में आता है।
इससे हम मृत आत्मा की शांति-तर्पण दान देकर उनका आशीर्वाद और कृपा प्राप्त कर सकते हैं। गरुड़ पुराण के अनुसार श्राद्ध कर्म से संतुष्ट होकर पितर हमें आयु, पुत्र, यश, वैभव, समृद्धि देते हैं। स्कंद पुराण के अनुसार, श्राद्ध में पितरों की तृप्ति ब्राह्मणों के द्वारा ही होती है। श्राद्ध के पिण्डों को गाय, कौवा अथवा अग्रि या पानी में छोड़ दें। पितृ दोष हो तो गृह एवं देवता भी काम नहीं करते तथा ऐसे जातक का जीवन शापित एवं अशांत हो जाता है। घर में कलह, सन्तानोत्पति में बाधा, शारीरिक व्याधियां, शुभ कार्य में विघ्न आदि होते रहते हैं। स्वप्न में मृत पूर्वजों को स्वप्न में देखना, पूजन स्थल पर जल रहा दीपक बुझ जाना, नौकरी, व्यापार में संकट आना पितृ दोष के लक्षण हैं। पितृ दोष से मुक्ति हेतु त्रिपिंडी श्राद्ध अवश्य करें, साथ ही साथ पितरों के निमित्त श्राद्ध पक्ष में तर्पण और श्राद्ध करें।
जो व्यक्ति माता-पिता का वार्षिक श्राद्ध नहीं करता, उसे घोर नरक की प्राप्ति होती है और उसका जन्म शुक योनि में होता है। शास्त्रों में कहा गया है कि जिस व्यक्ति की मृत्यु दुर्घटना में, विष से अथवा शस्त्र से हुई है, उनका श्राद्ध चतुर्दशी के दिन करना चाहिए। जिन व्यक्तियों को अपने माता-पिता की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है, ऐसे व्यक्ति को श्राद्ध पक्ष की अमावस्या को श्राद्ध कर्म संपन्न करना चाहिए। नवमी के दिन अपनी मृत मां, दादी, परदादी इत्यादि का श्राद्ध करना चाहिए।
जब मृत्यु के बाद मृत आत्माओं की इच्छाओं की पूर्ति नहीं होती तो उनकी आत्मा अप्रत्यक्ष रूप से प्रभाव दिखाती है, जिसके कारण अशुभ घटनाएं घटित होती हैं। इसे पितृदोष कहा जाता है। इस दोष के कारण दुर्भाग्य में भी वृद्धि होती है। पितृ दोष एक ऐसा दोष है, जो अधिकतर कुंडली में होता है। इस प्रकार का दोष होने पर व्यक्ति को कई प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। लोग पितृदोषों से मुक्ति हेतु हरिद्वार और नासिक आदि स्थानों पर जाते हैं।
जानिए पितृदोष से संबंधित कुछ बातें:-
किसी व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात जब परिजन उसकी अंतिम इच्छाओं की पूर्ति नहीं करते तो उसकी मृत आत्मा पृथ्वी पर भटकती रहती है।
जब मृत व्यक्ति के अधूरे कार्य पूरे नहीं किए जाते तो उसकी आत्मा परिवार पर अप्रत्यक्ष रूप से कार्यों को पूरा करने के लिए दबाब डालती है, जिसके कारण परिवार में कई बार अशुभ घटनाएं घटित होती हैं। यही पितृदोष होता है।
पितृदोष से मुक्ति हेतु श्राद्धपक्ष और हर महीने की अमावस्या पर पितरों की आत्मिक शांति के लिए पिंडदान और तर्पण करें।
कर्मलोपे पितृणां च प्रेतत्वं तस्य जायते।
तस्य प्रेतस्य शापाच्च पुत्राभारः प्रजायते।
अर्थात:- कर्मलोप की वजह से जो पूर्वज मृत्यु के बाद प्रेत योनि में चले जाते हैं। उनके श्राप से पुत्र संतान की प्राप्ति नहीं होती है। प्रेत योनि में पितर को कई कष्टों का सामना करना पड़ता है। यदि उनका श्राद न किया जाए तो वे हमें नुक्सान पहुंचाते हैं। पितरों का श्राद्ध करने से समस्याएं स्वयं समाप्त हो जाती हैं।
शास्त्रों के अनुसार :-
“पुन्नां नरकात् त्रायते इति पुत्र:‘‘ एवं ’’पुत्रहीनो गतिर्नास्ति”
अर्थात:- जिनके पुत्र नहीं होते उन्हें मरोणोपरांत मुक्ति नहीं मिलती। पुत्र द्वारा किए श्राद कर्म से ही मृत व्यक्ति को पुन नामक नर्क से मुक्ति मिलती है इसलिए सभी लोग पुत्र प्राप्ति की इच्छा रखते।

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