मुख्यपृष्ठस्तंभसटायर : कनाडा की डॉक्टरनी और मस्त मरीज

सटायर : कनाडा की डॉक्टरनी और मस्त मरीज

डाॅ. रवीन्द्र कुमार

एक खबर के मुताबिक, कनाडा में एक महिला डॉक्टर अपने मरीजों को जो बेसुध, बेहाल और बेहोश पड़े होते हैं, उनके साथ वह डॉक्टरनी ‘अभद्र’ व्यवहार करती थी। दोनों पार्टी खुश! शिकायत करेगा तो कौन? मरीज तो पहले ही बेहोश, बेहाल है। वह तो सोचते होंगे कोई सन्निपात जैसी स्थिति में सपना देखा है।
सपने सुहाने अस्पतालन के…मेरे नयनों में डोले बहार बनके
पीछे दिल्ली में एक कॉल-गर्ल रैकेट सामने आया था, जिसमें ‘वर्कर’ अपने आप को थिरेपिस्ट बता रही थीं और मेडिकल कॉल पर आयीं हुईं बता रही थीं। यह मात्र संयोग नहीं हैं अलबत्ता प्रयोग जरूर है। देखिए मेडिकल फील्ड ने कितनी तरक्की कर ली है। जल्द ही कनाडा से यह तरक्की फैलते-फैलते पूरी दुनिया में छा जाएगी। यह मामूली बात नहीं है। पिछले दिनों एक टीचर को पुलिस ने पकड़ा था, जिसने अपने स्टूडेंट को ही ‘सेवा’ में लगा रखा था। पकड़े जाने पर उसने बिंदास कह दिया कि यह सब ‘म्यूचल कन्सेंट’ से होता था। अतः इसमें पुलिस अथवा लड़के के मां-बाप का क्या लेना-देना। एक डॉक्टर ने मुझे बताया था कि एक साइक्लोजिकल डिसॉर्डर होता है, जिसमें महिला तैयार-त्यूर होकर रोजाना बिला नागा अस्पताल आ जातीं हैं। आउटिंग की आउटिंग हो जाती है और संगी साथियों से हॅलो- हाय हो जाती है और सबसे बड़ा, मनपसंद डॉक्टर को अपनी काल्पनिक पेट की समस्या अथवा कोई अन्य काल्पनिक समस्या का जिक्र करती हैं और फुल चेक अप का इनसिस्ट करतीं हैं। ए टू जेड।
अब यह कनाडा की डॉक्टरनी को क्या ही तो कमी रही होगी। या फिर वो कोई रिकॉर्ड बनाने निकली थी। एक खबर ये है कि उसकी प्रेक्टिस / क्लीनिक ठीक नहीं चल रहा था। अतः उसे यह पी.आर. की युक्ति सूझी। अब आप ही बताओ इस युक्ति के आगे अच्छे अच्छे डॉक्टर और उनके क्लीनिक फेल हैं। मैं सोचता हूं कि यह स्थिति यदि भारत में हो जाए तो मरीज मौज में हो जाएंगे। बार-बार वो उसी डॉक्टर से इलाज कराना चाहेंगे। और तो और जिद करेंगे कि आप हमें बेहोश न करें प्लीज।
बा-होशोहवास मैं दीवाना आज वसीयत करता हूं
ये दिल ये जां मिले तुमको मैं तुमसे तवक्को करता हूं
अब आप बेहोश, बेहाल, बेसुध ही कर दोगे तो हमारा क्या? आप कुछ तो हमारे तीर-ए-नीमकश का भी पास रखें। आप चाहें तो हमसे पहले ही ‘इंडेमिनिटी बॉन्ड’ साइन करा लें जी। पर प्लीज़ बेहोश न करें और अगर करना ही है तो अपनी आंखों के जाम से करें। नहीं तो असली जाम से करें। अपने को कहां ज्यादा दरकार है। फकत दो पेग काफी होंगे। आखिर मरीज हैं, वहां किसी को क्या पता चलना है कि कौन सी दवा-दारू चल रेली है। प्रसंगवश बताना चाहूंगा कि जिन डॉक्टर की बात हो रही है वे भारतीय/भारतीय मूल की ही हैं।

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