दूब चंदन अक्षत पुष्पों से
किया था तेरा स्वागत मैंने
एक रंगोली बनाई प्रीत के रंगों से
द्वार पर बांधा था बंदनवार
तुम आये थे मेरे मन के द्वार
बन कर मेरा प्रथम प्यार।
अग्नि की साक्षी में बंधा
आजीवन अटूट रिश्ता परिणय का
तेरी गहरी नीली आंखें
मेरी काली केश राशि
हमारी पहचान बनी थी
झरते हारसिंगार के मादक पुष्प
हमारी प्रीत के साक्षी थे
ग्रीष्म ऋतु में अमलतास की जादुई रंगत
पलाश की लाली सी गहराती प्रीत
केशों में बंधी महकती वेणी
नयनों में सजा काजल
सूचक है धरती से अम्बर तक
मेरे प्रिय के प्रति प्रीत की।
पतंग सतरंगी प्रीत की
कुछ अधिक उड़ान भर गई
सीमा थी बंधी हुई डोर की
नहीं उड़ पाई लम्बी उड़ान
क्षितिज का हाशिया दिया दिखाई
भारी हो गया अम्बर में तैरना
आशाओं की डोर उलझ रही।
पूछ रही हूं अपने आप से
मैं हारी हूं सपनों की ऊंचाई से
या विपरीत समय कै प्रवाह से।
-बेला विरदी
