मुख्यपृष्ठस्तंभब्रजभाषा व्यंग्य :  उत्सव’न कौ है अपनों आनंद

ब्रजभाषा व्यंग्य :  उत्सव’न कौ है अपनों आनंद

नवीन सी. चतुर्वेदी

क्या देख सकते हैं उसी से आत्मजा के रूप को
जिस दृष्टि से हम देखते हैं प्रेमिका के रूप को
लै भाई घुटरू जाकौ साल भर इंतजार कियौ जावै वौ रास गरबा डांडिया कौ सीजन यानी नवरात्रि आय गयीं। अब तौ बस मस्ती, धमाल और बस मजा ही मजा। कभू यहाँ कभू वहाँ। कभू यै ड्रैस कभू वौ ड्रैस। कभू या तरियाँ सों नाचंगे कभू वा तरियाँ सों।
हाँ बत्तो उत्सव’न कौ अपनों आनंद है। हालाँकि, उत्सव जेब ढीली कर देमें हैं, मगर ये न होंय तौ जीवन कितनों नीरस लगै है। का लोग का लुगैया और का छोरा-छोरी सब कृष्ण और गोपी स्वरूपा बन जामंगे। पिछले एक महीना सों डांस क्लास चल रही हैं। घर भर कों अपनी अँगुरिय’न के इसारे’न पै नचायवे वारे पैसा चुकाय कें नाचवौ सीख रहे हैं। घुटन्ना पहर कें घूमवे वारे नख ते शिख तक पहरवे वारे कपड़ा खरीद रहे हैं। जो खरीद नाँय सकें वे या तौ भाड़े पै लामंगे हैं या माँगें-ताँगें काम चलामंगे।
यै सब तौ ठीक मगर एक बात कहौं घुटरू कछू मर्द-मांस ऐसे सुंदर रंग में हू भंग कर डारें हैं। निपूते’न के अधर’न पै तौ अंबा होवै है मगर मन में रंभा। नासपीटे’न कों विनके घरबारे’न नें देखनगत सिखाई ही नाँय नें। उत्सव केवल लोग’न के लिएं ही थोरें ही होवै है, लुगैया’न के लिएं हू तौ होवै है। लोग’न कों आनंद लूटनों है तौ लुगैया’न कों हू तौ आनंद लूटनों है। हम लुगैया आनंद लूटवे के लिएं काहू दूसरे ग्रह पै जामंगी का? पैर ओढ़ कें, सज सँवर कें अपने आस पास के लोग’न के संग ही तौ त्यौहार मनामंगी। का बताओं घुटरू कोउ-कोउ ज्वानीपीटौ तौ ऐसें देखै है जैसें वाकी आँख’न में एक्सरे की मसीन लगी होय। एक क्षण के लिएं तौ आत्मा हिल जावै मगर आज की नारी अब इन सब बात’न की अभ्यस्त है चुकी है। शी नो’स हाउ टु हैंडल।
हाँ बत्तो तू ठीक कह रही है। सबरौ खेल देखनगत कौ ही है। वौ एक डायलॉग है नें आदमी बोलना तो पैदा होते ही सीख जाता है मगर क्या, कैसे और कितना बोलना है यै सीखवे में सबरी उमर निकर जावै है। भगवान नें आँखें तौ सबन्ह कों दीनी हैं बस देखवौ हमें स्वयं सीखनों होवै है। सही कहों तौ द्रष्टा तौ ऐसे होने चैंयें-
है दृष्टि सबके पास लेकिन श्रेष्ठ द्रष्टा है वही
आकाश बनकर देखता है जो धरा के रूप को

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