मुख्यपृष्ठस्तंभगपशप : महा-युति की मजेदार कलगीबाजी... जनता दरबार बनाम याचिका दरबार 

गपशप : महा-युति की मजेदार कलगीबाजी… जनता दरबार बनाम याचिका दरबार 

राजन पारकर

ठाणे जिले की राजनीति का नाम लेते ही एकनाथ शिंदे का नाम अनिवार्य है। ‘ठाणे मतलब शिंदे और शिंदे मतलब ठाणे’, ऐसी शहरी कहावत है। यह कहावत कितनी खोखली है, इसका जीता-जागता उदाहरण गणेश नाईक के जनता दरबार में दिखाई देता है। हाल के दिनों में नई मुंबई-ठाणे-पालघर की फिजाओं में कुछ अलग ही हवा बह रही है। यह हवा है भाजपा के वनमंत्री गणेश नाईक के जनता दरबार की।
दरबार का दृश्य देखिए- जनता आती है, समस्याएं बताती है, अफसर सामने बैठते हैं, मंत्री झटपट निवारण करते हैं और सबसे जरूरी बात, जनता खुश!
मजेदार बात यह है कि ठाणे में शिंदे साहब की पकड़ अपार होने के बावजूद, जनता दरबार नाईक के यहां सज रहा है। यानी यह दरबार दरअसल ठाणे में ‘शिंदे-शैली की कार्यक्षमता के अभाव’ का आईना है। जनता तो साफ कह रही है, ‘शिंदे साहब, आप तो दिखते ही नहीं, काम करवाना तो दूर की बात है; लेकिन नाईक दरबार में जाते हैं तो कम-से-कम सुन तो लेते हैं!’
इसी बीच शिंदे गुट के जिलाध्यक्ष किशोर पाटणकर ने उठा ली याचिका की तलवार। विरोधी नहीं, बल्कि अपने ही सत्ता-गठबंधन से अदालत पहुंचकर नाईक का दरबार रोकने का प्रयत्न! यानी जनता कहती है- ‘हमें काम चाहिए’ और गुटाध्यक्ष कहते हैं- ‘नहीं, इससे हमारे राजनीति का नुकसान होता है!’
जनता की नजर से हिसाब बड़ा सीधा है। ठाणे में शिंदे की पकड़ भले ही हो, पर लोग कहते हैं, ‘शिंदे दरबार नहीं, तो नाईक दरबार!’ नाईक का दरबार ७०-८० फीसदी मामलों का समाधान करता है, यही तो शिंदे की कार्यशैली का असली सबूत है।
महायुति का यह युद्ध तो कुछ ऐसा है- ‘अपने आंगन में दीपक न जलाना और पड़ोसी का दीपक बुझाने की कोशिश करना’। जनता दरबार में नागरिक खुश हैं, मगर शिंदे गुट की बेचैनी बढ़ रही है। क्योंकि जितना नाईक का दरबार सफल होता है, उतना ही शिंदे-शैली का जवाबी अभाव उजागर होता है।
‘ठाणे पर पकड़ कही जाती है शिंदे की! मगर यह पकड़ अब कितनी खोखली साबित हो रही है। जब जनता हाथ छुड़ाकर नाईक के दरबार में कतार लगाती है, तो यह पकड़ सिर्फ ‘राजनीतिक हेडलाइन’ रह जाती है। जनता के दिल में शिंदे की अधोगति ही सच्चाई है। गणेश नाईक का जनता दरबार तो शिंदे के कामों का आईना है और उसमें जो प्रतिबिंब दिख रहा है, वह कतई आकर्षक नहीं शिंदे की बेचैनी बढाने वाला है!’

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