मुख्यपृष्ठस्तंभहनीफनामा : सेंसर बोर्ड की क्या आवश्यकता है?

हनीफनामा : सेंसर बोर्ड की क्या आवश्यकता है?

हनीफ जवेरी

सच मानिए, समय के साथ बहुत कुछ बदल चुका है। पहले की फिल्मों और आज की फिल्मों में जबरदस्त अंतर दिखाई देता है। सेंसर बोर्ड के नियम और उसका रवैया भी समय के साथ काफी बदला है।
सन् १९५० के दशक में बनी मशहूर फिल्म ‘मदर इंडिया’ में एक बलात्कार का दृश्य था। जब यह फिल्म सेंसर बोर्ड के सामने रखी गई, तो बोर्ड के सदस्यों ने इस दृश्य पर कड़ा एतराज जताया। वजह यह थी कि उस दृश्य में अभिनेत्री नरगिस का ब्लाउज ज्यादा फट गया था, जिससे उनका खुला हुआ हाथ साफ दिख रहा था। निर्माता महबूब खान ने इस दृश्य को जस का तस पास करवाने की पूरी कोशिश की, परंतु उन्हें सेंसर बोर्ड के निर्देश पर वह दृश्य दोबारा शूट करना पड़ा। तब जाकर फिल्म को मंजूरी मिली।
इसी तरह का सख्त रवैया ९० के दशक में भी देखने को मिला, जब करिश्मा कपूर अभिनीत फिल्म ‘खुद्दार’ के एक गीत ‘सेक्सी सेक्सी सेक्सी मुझे लोग बोले…’ पर सेंसर बोर्ड ने आपत्ति जताई थी। सिर्फ ‘सेक्सी’ शब्द के कारण सेंसर बोर्ड ने इस गीत को अश्लील ठहराया और इस शब्द को बदलने की मांग की। अंतत: निर्माता को ‘सेक्सी’ की जगह ‘बेबी’ शब्द करना पड़ा।
लेकिन आज लगता है जैसे सेंसर बोर्ड आंख मूंदकर फिल्में देखता है। आज की फिल्मों में इतने अश्लील दृश्य होते हैं कि उन्हें गिनाना कठिन है। होंठों से होंठ मिलानेवाले दृश्य तो सामान्य बात हो गई है। कई फिल्में ऐसी हैं, जिन्हें परिवार के साथ बैठकर देखना असंभव है। यह कहना भी पूरी तरह सही नहीं होगा कि पहले की फिल्मों में अश्लील दृश्य या गीत नहीं होते थे। फर्क इतना है कि उस समय सेंसर बोर्ड का रवैया कभी सख्त और कभी ढीला-ढाला रहा, परंतु आज की तुलना में दोनों में बड़ा अंतर है।
सन् १९६० के दशक की महमूद अभिनीत फिल्म ‘पड़ोसन’ के एक दृश्य में महमूद अपनी लुंगी को विशेष ढंग से पकड़कर सायरा बानो का सूटकेस उठाते हैं और कहते हैं- ‘देवी जी, हमने सामान अच्छी तरह से पकड़ा है।’ समझदार दर्शक तुरंत समझ गए कि ‘सामान’ से उनका इशारा निजी अंगों की ओर है। मगर उस समय सेंसर बोर्ड के सदस्यों को शायद यह संकेत समझ नहीं आया या फिर वे भी इस संवाद का आनंद ले रहे थे।
फिल्म ‘इज्जत’ का एक गीत है, ‘जागी बदन में ज्वाला, सैंया तूने क्या कर डाला?’ का भाव भी किसी से छिपा नहीं। इसी तरह हेमंत कुमार का एक गीत है, ‘जब जाग उठे अरमान तो वैâसे नींद आए?’ का आशय भी स्पष्ट है। फिल्म ‘मैं सिंदूर हूं’ का गीत सबसे चौंकाने वाला है, ‘आज मैं जवान हो गई हूं, खिल के गुलिस्तां हो गई हूं, ये दिन, ये साल, ये महीना, भूलेगा मुझको कभी ना।’
तो अब सवाल यह उठता है कि जब समय इतना बदल चुका है, तो क्या आज भी सेंसर बोर्ड की आवश्यकता है?
आज के डिजिटल युग में, जब हर प्रकार का सामग्री बिना किसी रोक-टोक के इंटरनेट पर उपलब्ध है, सेंसर बोर्ड की भूमिका पर गंभीर बहस होना जरूरी है। क्या यह संस्था केवल औपचारिकता निभाने तक सीमित रह गई है या फिर वाकई समाज के नैतिक मानदंड तय करने का अधिकार रखती है? यदि दर्शक स्वयं यह तय कर सकते हैं कि उन्हें क्या देखना है और क्या नहीं, तो फिर सेंसरशिप का वास्तविक उद्देश्य क्या रह जाता है?

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