श्रीकिशोर शाही
हाल के दिनों में भारत की न्यायपालिका काफी सुर्खियों में रही है। कभी किसी खास मुकदमे को लेकर तो कभी किसी माननीय विद्वान न्यायाधीश की किसी खास टिप्पणी को लेकर। हाल ही में मुख्य न्यायाधीश महोदय की भगवन विष्णु को लेकर की गई टिप्पणी ने मीडिया में खूब सुर्खियां बटोरी। फिर उन्होंने कहा कि उनका ये मतलब नहीं, बल्कि वो मतलब था। खैर, ये सब तो चलता ही रहता है। मगर न्यायपालिका का एक सबसे दुखद पक्ष यह है कि वहां अधिकांश मुकदमों की रफ्तार इतनी धीमी है कि ‘नौ दिन चले अढ़ाई कोस’ की कहावत भी पुरानी हो गई है। अब तो कुछ मामलों में नौ दिन में ढाई सौ मीटर या ढाई मीटर या इंच भी गाड़ी नहीं खिसक पाती है। शायद इसका कारण न्यायपालिका पर जरूरत से ज्यादा बोझ का होना है। मान लीजिए कि कैपिसिटी १०० मुकदमे निपटाने की है और बोझा है हजार या दस हजार का। तो फिर रफ्तार तो यूं ही रहेगी न।
हाल ही में एक खबर आई है कि एक आरोपी को करीब ४० साल बाद न्याय मिला। उसके ऊपर १०० रुपए की रिश्वत लेने का आरोप था। आज भले ही १०० रुपए की कोई वकत न रही हो, पर ४० साल पहले काफी वैल्यू रही होगी। मामला रायपुर का है। वहां मध्य प्रदेश परिवहन निगम के एक कर्मचारी पर यह आरोप लगा था कि उसने बकाया एरियर राशि बनाने और पास करने के लिए १०० रुपए की रिश्वत मांगी थी। जिससे रिश्वत मांगी गई थी, उसने लोकायुक्त से इसकी शिकायत कर दी। फिर ट्रैप लगाकर आरोपी को पकड़ लिया गया। निचली अदालत में मामला चला और आरोपी को सजा हो गई। इसके बाद आरोपी ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने कहा कि रिश्वत मांगने का कोई पक्का सबूत नहीं मिला। इसके बाद आरोपी को बरी कर दिया गया। यह तो एक मामला हुआ, ऐसे न जाने कितने मामले हैं जिनमें फैसले आने में कई दशक निकल जाते हैं। भागलपुर अंखफोड़वा कांड, भोपाल गैस कांड, दिल्ली के दंगे जैसे कई मामले इसका उदाहरण हैं। क्या ये अच्छा नहीं होता कि सरकार इस क्षेत्र में व्यापक सुधार करे, ताकि आम आदमी को जीवित रहते न्याय मिल जाए क्योंकि लंबे चलनेवाले मामलों में कई बार वादी-प्रतिवादी वगैरह के नहीं रहने की खबरें भी आती ही रहती हैं।
