मुख्यपृष्ठस्तंभसाहित्य शलाका : स्त्री-संवेदना की सशक्त आवाज! -अमृता प्रीतम

साहित्य शलाका : स्त्री-संवेदना की सशक्त आवाज! -अमृता प्रीतम

प्रो. दयानंद तिवारी

भारतीय साहित्य जगत में यदि किसी नाम को स्त्री चेतना की पहचान और मानवीय संवेदना का स्वर कहा जाए तो वह नाम निश्चय ही अमृता प्रीतम का है। हिंदी और पंजाबी की सुप्रसिद्ध कवयित्री, लेखिका तथा उपन्यासकार अमृता प्रीतम ने न केवल स्त्री के अंतर्मन की पीड़ा और उसकी आकांक्षाओं को अभिव्यक्ति दी, बल्कि जीवन की असंख्य गुत्थियों को भी अपनी लेखनी में साकार किया। वे केवल साहित्यकार ही नहीं थीं, बल्कि युग की सशक्त प्रतिनिधि थीं।
जीवन परिचय और साहित्यिक पृष्ठभूमि
अमृता प्रीतम का जन्म ३१ अगस्त १९१९ को तत्कालीन अविभाजित भारत के पंजाब प्रांत के गुजरांवाला (अब पाकिस्तान) में हुआ। बचपन से ही उनका झुकाव साहित्य की ओर रहा। मात्र सोलह वर्ष की उम्र में उन्होंने अपनी पहली कविता-संग्रह प्रकाशित की। आरंभिक जीवन में ही मां का साया उठ जाने के कारण अमृता ने गहन पीड़ा का अनुभव किया, जो आगे चलकर उनके साहित्य का आधार बनी। विभाजन की त्रासदी ने उनके संवेदनशील मन पर गहरा प्रभाव डाला और उनकी कविताओं में यह पीड़ा बार-बार मुखर हुई।
साहित्यिक योगदान
अमृता प्रीतम का साहित्य बहुआयामी है। उन्होंने कविता, उपन्यास, आत्मकथा, निबंध और रेडियो वार्ताओं के माध्यम से अपनी भावनाओं और विचारों को व्यक्त किया। उनका सबसे प्रसिद्ध कविता-संग्रह पिंजर भारतीय स्त्री के दुख, विछोह और उसकी अस्मिता की गाथा है। इस उपन्यास पर बनी फिल्म ने भी भारतीय दर्शकों को झकझोर दिया।
उनकी कविताएं मात्र भावुकता नहीं, बल्कि जीवन की गहन यथार्थता का उद्घाटन हैं। वे लिखती हैं—
‘एक ग़ुस्सा था रुके हुए पानी की तरह, जिसके निकलने की कोई राह नहीं थी। इसलिए जहां वह रुका हुआ था, उन दीवारों को ही चाट रहा था।’
यह पंक्तियां स्पष्ट करती हैं कि अमृता ने मनुष्य की अंतरंग संवेदनाओं को कितनी गहराई से समझा और व्यक्त किया।
स्त्री-अस्मिता की प्रवक्ता
अमृता प्रीतम का सबसे बड़ा योगदान स्त्री-अस्मिता की आवाज को साहित्य में प्रतिष्ठित करना है। उन्होंने स्त्री को केवल गृहस्थ जीवन की परिधि में सीमित नहीं माना, बल्कि उसे स्वतंत्र और पूर्ण व्यक्तित्व के रूप में चित्रित किया। वे मानती थीं कि भारतीय समाज पुरुष को तो औरत से काम करने की आदत डलवाता है, परंतु उसकी बुद्धिमत्ता और बराबरी स्वीकार करने से कतराता है। उन्होंने लिखा, `एक सशक्त महिला के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलना अब भी पुरुष को सहज नहीं लगता।’
अमृता के लेखन ने यह साबित किया कि स्त्री केवल कथा की पात्र नहीं, बल्कि स्वयं कथा-लेखक है। वह अपने जीवन की कहानी गढ़ सकती है, अपने निर्णय स्वयं ले सकती है और अपने व्यक्तित्व को स्वतंत्र रूप से गढ़ने की क्षमता रखती है।
विभाजन और मानवीय त्रासदी
भारत का विभाजन अमृता प्रीतम की चेतना में स्थायी पीड़ा के रूप में अंकित हुआ। उन्होंने देखा कि किस प्रकार मनुष्य धर्म और जाति के नाम पर एक-दूसरे का खून बहा रहा है। उनकी प्रसिद्ध कविता ‘अज्ज आखां वारिस शाह नूं’ (आज मैं वारिस शाह से कहती हूं) विभाजन की त्रासदी का हृदयविदारक चित्र प्रस्तुत करती है। इस कविता में उन्होंने पंजाबी की लोककथा हीर-रांझा के रचयिता वारिस शाह को पुकारते हुए कहा कि अब पंजाब की धरती फिर से कराह रही है, औरतों की इज्जत लूटी जा रही है और इंसानियत खून में डूबी पड़ी है। यह कविता केवल साहित्य नहीं, बल्कि इतिहास की करुण गाथा है।
प्रेम और अमृता
अमृता प्रीतम का जीवन प्रेम के बिना अधूरा है। उनका व्यक्तित्व इस सत्य का साक्ष्य है कि प्रेम केवल भावनाओं का आवेग नहीं, बल्कि जीवन की संपूर्णता है। उनका गहरा लगाव पंजाबी कवि और चित्रकार साहिर लुधियानवी से रहा, जिसने उनके लेखन में अनेक संवेदनशील आयाम जोड़े। यद्यपि यह प्रेम अधूरा रहा, किंतु इसी अधूरेपन ने अमृता के साहित्य को गहराई प्रदान की। बाद के जीवन में उन्होंने चित्रकार इमरोज के साथ अपना जीवन व्यतीत किया, जो उनके लिए प्रेरणा और संबल बने।
अमृता के विचार : जीवन-दर्शन
अमृता प्रीतम का लेखन केवल भावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन है। वे मानती थीं कि
‘ज्ञान हमेशा किसी को सौंपकर जाना चाहिए।’
‘किसी भी गलत धागे से रोष या गुण-स्वरूप में जीवन की निशानी सदा रहती है।’
`जिसके साथ होकर भी तुम अकेले रह सको, वही साथ करने योग्य है।’
ये कथन केवल व्यक्तिगत अनुभव नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने वाले सत्य हैं।
आत्मकथा और निजी अनुभव
अमृता प्रीतम की आत्मकथा रसीदी टिकट साहित्य जगत में एक अनोखा दस्तावेज है। इसमें उन्होंने अपने जीवन की खुली स्वीकारोक्ति की है। इस आत्मकथा से यह स्पष्ट होता है कि अमृता ने अपने जीवन को बिना किसी झूठ या दिखावे के जिया। उनका साहस यही था कि वे अपनी कमजोरियों और पीड़ाओं को भी निडर होकर स्वीकार करती थीं।
भाषा और शैली
अमृता प्रीतम की भाषा सरल, सहज और अत्यंत संवेदनशील है। उनकी लेखनी में एक ओर लोकजीवन की सादगी है, तो दूसरी ओर दर्शन की गहराई। उनकी शैली स्त्री के अंतर्मन की सहज अभिव्यक्ति है, जिसमें न तो अलंकारिक बोझ है और न ही कृत्रिमता। यही कारण है कि उनका साहित्य आज भी पाठकों को उतना ही आकर्षित करता है, जितना उनके समय में।
अमृता की प्रासंगिकता
आज जब स्त्रियों की अस्मिता, अधिकार और समानता के प्रश्न समाज में चर्चा के केंद्र हैं, अमृता प्रीतम का लेखन और भी अधिक प्रासंगिक हो उठता है। उन्होंने जिस आवाज को दशकों पहले उठाया, वह आज भी उतनी ही गूंजती है। उनका साहित्य हमें यह सिखाता है कि स्त्री केवल घर-आंगन की शोभा नहीं, बल्कि समाज की निर्माता और भविष्य की आधारशिला है। अत: अमृता प्रीतम का व्यक्तित्व और कृतित्व भारतीय साहित्य में अमिट छाप छोड़ चुका है। वे केवल कवयित्री नहीं, बल्कि युगद्रष्टा थीं। उन्होंने विभाजन की त्रासदी को आवाज दी, स्त्री-अस्मिता को शब्द दिए और प्रेम को जीवन का शाश्वत सत्य बताया। उनकी कविताएं और कहानियां आने वाली पीढ़ियों के लिए पथ-प्रदर्शक हैं।
इसलिए निस्संदेह कहा जा सकता है कि-
‘अमृता प्रीतम केवल एक नाम नहीं, बल्कि भारतीय साहित्य में स्त्री चेतना और मानवीय संवेदना का पर्याय हैं। उनका साहित्य हमारे समाज को आत्मावलोकन और संवेदनशीलता की राह दिखाता रहेगा।’
(लेखक आचार्य एवं शोध निदेशक, श्री जे.जे.टी. विश्वविद्यालय व सुप्रसिद्ध शिक्षाविद, साहित्यकार एवं राष्ट्रवादी विचारक है)

अन्य समाचार