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महायुति सरकार की उदासीनता बनी काल…महाराष्ट्र की हवा में जहर घोल रही है राख!

-७ थर्मल पॉवर प्लांट्स में करोड़ों टन का लगा है ढेर…लाखों लोग सांस की बीमारी से हो रहे हैं पीड़ित

धीरेंद्र उपाध्याय / मुंबई

कारखानों से निकलनेवाली राख को निपटाने के प्रति महायुति सरकार की उदासीनता आज महाराष्ट्र की जनता के लिए काल साबित हो रही है। राज्य के ७ थर्मल पॉवर प्लांट्स में करोड़ों टन राख का अंबार लगा हुआ है और वही जहरीली राख अब हवा में घुलकर पूरे राज्य की जनता की सांसों में जहर घोल रही है। नतीजतन, लाखों नागरिक दमा, सांस की तकलीफ और घातक बीमारियों की चपेट में हैं। हालांकि, सत्ता में बैठे हुक्मरान मौन हैं, लेकिन धरातल पर जनता रोज जहर निगलने को मजबूर है।
राज्य के सात थर्मल पॉवर प्लांट्स नासिक, भुसावल, परली, पारस, खापरखेडा, कोराडी और चंद्रपुर में १०,२०० मेगावॉट क्षमता बिजली पैदा करने के लिए वर्ष २०२४-२५ में ४३३.९ करोड़ टन कोयला जलाया गया। इससे सातों थर्मल पॉवर प्लांट्स से १६.५३ करोड़ मीट्रिक टन राख पैदा हुई।
बच्चे, बूढ़े, युवा सभी को बीमार बना रहा है प्रदूषण!..आंखें मूंदे बैठी है सरकार

राज्य में करोड़ों टन राख हवा में प्रदूषण कर रही हैं। इससे लोगों में श्वसन संबंधी बीमारियां बढ़ रही हैं। यह किसी प्राकृतिक आपदा के चलते नहीं, बल्कि मानव निर्मित करोड़ों मीट्रिक टन राख से पैâल रहे प्रदूषण का है। आलम यह है कि छोटे-छोटे बच्चे दमे से जूझ रहे हैं। बुजुर्ग फेफड़ों की बीमारी में कराह रहे हैं और युवा समय से पहले गंभीर रोगों के शिकार हो रहे हैं। जिस राख को वैज्ञानिक तरीके से नष्ट किया जाना चाहिए था, वही राख अब जहरीला ‘बम’ बनकर हर सांस को तकलीफदेह बना रही है।
इस बीच केंद्र और राज्य सरकार ने राख के पर्यावरणीय दुष्प्रभाव को कम करने के लिए कई अधिसूचनाएं और नीति निर्देश जारी किए। चार थर्मल पॉवर प्लांट्स पर केंद्रीय नीति का कुछ हद तक पालन किया गया। लेकिन कोराडी, खापरखेडा और चंद्रपुर में कार्यान्वयन शून्य रहा। इसी क्रम में कल नीति में मामूली बदलाव कर सरकारी आदेश तो जारी कर दिया गया, लेकिन इसके कारगर साबित होने पर संदेश जताया जा रहा है।
राख बिक्री में भी अराजकता
राज्य के सभी प्रमुख थर्मल पावर प्लांटों में राख के विशाल ढेर जमा हैं। लेकिन सरकार इसका उपयोग सुनिश्चित करने में पूरी तरह विफल दिखाई दे रही है। जनता को प्रदूषण और जोखिमों के बीच छोड़कर सरकार सिर्फ उद्योगपतियों की जेब भरने में लगी है। सरकार की नीति से स्पष्ट हो गया है कि राख की बिक्री और परिवहन में उद्योगपतियों को लाभ पहुंचाने का काम हो रहा है, जबकि स्थानीय र्इंट उत्पादक, एमएसएमई और परियोजना प्रभावित क्षेत्र लगातार पीछे छूटते रहे हैं।
उद्योगपतियों की कठपुतली
सरकार की नीतियों की पोल अब खुलकर सामने आ चुकी है। पर्यावरण संरक्षण और जनस्वास्थ्य की रक्षा का दावा करने वाली महायुति सरकार वास्तव में उद्योगपतियों की कठपुतली बन चुकी है। करोड़ों टन राख का जहर हवा में घुल रहा है, लेकिन जिम्मेदार मंत्री और अधिकारी सिर्फ कुर्सी बचाने की राजनीति में मशगूल हैं। जनता मर रही है, बच्चे दम घुटकर बीमार हो रहे हैं, गांव-शहर राख की धूल से ढक गए हैं। फिर भी सरकार आंखें मूंदे बैठी है।

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