-स्थानीय चुनाव जीतने के लिए १०० बकरे और ३ करोड़ करने पड़ते हैं खर्च…शिंदे गुट के विधायक ने कबूला काला सच
सामना संवाददाता / मुंबई
महाराष्ट्र की राजनीति में पैसे और बाहुबल का काला खेल किसी से छिपा नहीं है। चुनाव जीतने के लिए पैसा पानी की तरह बहाया जाता है। चुनाव में भाजपा और शिंदे गुट ने जमकर पैसे खर्च किए हैं। इस बात को शिंदे गुट के विधायक संजय गायकवाड ने कबूल किया है। चुनाव में बेहिसाब खर्चे के काले सच को स्वीकार करते हुए संजय गायकवाड ने कहा कि अब सिर्फ जिला परिषद के चुनाव के लिए ३ से ४ करोड़ रुपए खर्च होते हैं और सैकड़ों बकरे अलग से देने पड़ते हैं।
बता दें कि गायकवाड के इस बयान से महायुति की जीत का फॉर्मूला भी साफ हो गया है। जब जिला परिषद के चुनाव में इतनी बड़ी रकम खर्च हो रही है तो मनपा और विधायक के चुनाव में क्या हाल होगा। संसदीय चुनाव में किस कदर पैसे खर्च किए गए होंगे। यह सवाल जनता के में उठने लगा है। लोगों का कहना है कि यह लोकतंत्र नहीं, बल्कि धनतंत्र है, जहां आम जनता और गरीब उम्मीदवार कभी मुकाबले में उतर ही नहीं सकते। गायकवाड के इस बयान से यह भी साबित होता है कि महायुति सरकार ने चुनाव सुधार और पारदर्शिता के नाम पर जनता को सिर्फ धोखा दिया है।
शिंदे गुट के ही विधायक संजय गायकवाड ने खुद कबूल कर लिया कि जिला परिषद चुनाव जीतने के लिए करोड़ों रुपए और सैकड़ों बकरों की बलि देनी पड़ती है। गायकवाड ने साफ कहा कि अब चुनाव पहले जैसे नहीं रहे। कुल ३ से ४ करोड़ रुपए तक खर्च करना पड़ता है। इतना ही नहीं, कई जगह १०० बकरों तक की बोली लगती है। यह बयान न सिर्फ चौंकानेवाला है, बल्कि सीधे-सीधे सरकार और चुनाव आयोग की पोल खोलनेवाला है।
मंडी बन चुका है चुनाव!
समाजसेवक रमाकांत गुप्ता ने कहा कि सवाल यह है कि अगर सत्ता पक्ष के विधायक ही खुलेआम मान रहे हैं कि चुनाव अब करोड़ों की मंडी बन चुके हैं तो फिर जनता की मेहनत की कमाई से चलने वाले लोकतंत्र की यह पूरी व्यवस्था किसके लिए है?
वडाला से कांग्रेस नेता राकेश पांडे ने कहा कि बीजेपी गठबंधन सरकार जहां एक ओर पारदर्शी शासन और भ्रष्टाचार मुक्त राजनीति के दावे करती है, वहीं उनके अपने विधायक ही बता रहे हैं कि चुनाव जीतने के लिए नोटों और बकरों का सौदा करना पड़ता है।
विपक्ष ने सवाल दागा है कि क्या यह सरकार सिर्फ पूंजीपतियों और धनबलियों का लोकतंत्र बना रही है? क्या आम जनता की आवाज अब सिर्फ पैसों और बकरों के शोर में दबकर रह जाएगी?
