राजन पारकर
राज्य में इस बार बारिश ने किसान की कमर तोड़ दी। खेत बर्बाद, सोयाबीन सड़ गया, घर उजड़ गए, लेकिन सरकार की आंखों में अभी भी धूप ही धूप है। विपक्ष महीनों से चिल्ला रहा था- ‘गीला सूखा (अकाल-अतिवृष्टि) घोषित करो!’ सरकार ने कान बंद कर लिए। मगर मजा तो तब आया, जब सत्ता पक्ष के ही विधायक संतोष बांगर ने एलान ठोक दिया- ‘गीला सूखा घोषित करो और १०० प्रतिशत मुआवजा दो, ३०-४०-५० फीसदी की भिखारी रोटी नहीं चाहिए!’ अब सरकार के पंडाल में बिजली गिरी।
फडणवीस-अजीतदादा अब तक टेंशन-फ्री होकर ‘सब ठीक है’ का राग अलाप रहे थे, लेकिन जब अपने ही विधायक ने उनकी नींद तोड़ी तो सरकार के माथे से पसीना छलक पड़ा। गांव में जाओ तो किसान के खेत में सिर्फ गंध ही गंध है। अनाज का नामोनिशान नहीं और दिल्ली-मुंबई के हवाई महलों में बैठे ये लोग अब भी प्रतिशत गिनते फिर रहे हैं।
माढा के विधायक अभिजीत पाटील ने तो और भी करारा तमाचा मारा- ‘किसानों को तुरंत ५० हजार रुपए की मदद दो, वरना विधानसभा में हंगामा होगा!’ यहां तक कि उन्होंने कहा- नवरात्र का तमाशा बंद करो, पहले बाढ़ पीड़ितों को सहारा दो। जब विधायक ही जनता के दर्द पर गरज रहे हैं तो समझ लीजिए सरकार की छतरी से मूसलाधार पानी टपक रहा है।
किसान डूब रहा है, व्यापारी बरबाद हो रहा है, स्कूल बह गए हैं। फडणवीस कहते हैं – ‘कोल्हापुर मॉडल पर मदद देंगे।’ पर सवाल यह है- मदद देंगे या फिर कमिटी बैठाकर रिपोर्ट में किसानों का और समय डुबो देंगे?
आज सत्ता के अपने लोग ही सरकार को आईना दिखा रहे हैं। कल अगर यही किसान और जनता इस सरकार की नाव ही पलट दे, तो हैरानी कैसी?
बारिश ने किसान का खेत बहा दिया, और सरकार ने किसान का सब्र। विपक्ष तो पहले से गरज रहा था, अब अपने ही विधायक सरकार के माथे पर भीगा नारियल फोड़ रहे हैं। सत्ता की छतरी अब किसानों को नहीं, खुद मंत्रियों को भिगाने वाली है!
