मुख्यपृष्ठस्तंभसम-सामयिक : ईमानदार राहुल की राजनीतिक रणनीति में बदलाव की जरूरत!

सम-सामयिक : ईमानदार राहुल की राजनीतिक रणनीति में बदलाव की जरूरत!

डॉ. सी पी राय

कांग्रेस के नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने बड़े जोर-शोर से दो बार प्रेस कान्प्रâेंस कर वोट चोरी के मुद्दे को उठाया जो दरअसल अभी तक वोट की हेराफेरी या गलत तरीके से वोट जुड़वाना और कटवाना सिद्ध करता हुआ दिखलाई पड़ा है। अभी उनका दावा है कि सटीक प्रमाणों के साथ आगे चलकर वो जो खुलासा करने वाले हैं, वो हाइड्रोजन बम साबित होगा।
वोट चोरी का डंक!
वोट चोरी और बिहार को गरमाने के लिए उन्होंने कई दिन बिहार में यात्रा भी निकली, जिसमें काफी बड़ी तादात में जनता शामिल होती दिखलाई पड़ी। ऐसा लगता है कि राहुल गांधी कहीं न कहीं वोट चोरी और चुनाव की हेराफेरी तथा उसमें चुनाव आयोग की मिलीभगत को मुद्दा बनाने में कामयाब होते दिख रहे हैं और ये तब स्पष्ट हुआ जब बिहार में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह एक सभा को संबोधित कर रहे थे और गलती से उन्होंने जनता से पूछ लिया कि राहुल किस मुद्दे को लेकर यात्रा कर रहे थे तो सारी जनता ने चिल्लाकर कहा कि `वोट चोरी’ और इस जवाब ने अमित शाह को थोड़ा विचलित कर दिया था। ये तो स्पष्ट है कि अभी तक के प्रमाणों ने जनता में चर्चा तो शुरू कर दी है लेकिन चुनाव आयोग लगातार सभी आरोपों को नकारता जा रहा है। राहुल गांधी द्वारा दिए गए तथ्यों और आरोपों के अनुसार, कर्नाटक की सीआईडी जो वोट चोरी की जांच कर रही है उसने चुनाव आयोग को १८ चिट्ठियां लिखकर कुछ जानकारी मांगी लेकिन चुनाव आयोग ने वो उपलब्ध नहीं करवाई। आरोप ये भी लगाया गया कि खुद कर्नाटक के चुनाव आयोग ने भी तमाम जरूरी जानकारी केंद्रीय चुनाव आयोग से मांगी पर उन्हें भी वो जानकारी उपलब्ध नहीं करवाई गई। सवाल ये भी है कि जब जानकारी चुनाव आयोग से मांगी जा रही है और आरोप भी चुनाव आयोग पर ही लग रहे हैं तो आगे बढ़कर भाजपा इन सवालों का जवाब क्यों देने लगती है? इन बातों ने जनता के मध्य कुछ सवाल खड़े कर दिए हैं।
पिछले प्रेस कॉन्प्रâेंस के बाद राहुल गांधी के ट्वीट ने जिसमें उन्होंने देश के नौजवानों, छात्रों और जेन-जी से आह्वान कर दिया कि आगे आएं और चुनाव की शुचिता की लड़ाई लड़ते हुए भारत के लोकतंत्र और संविधान को बचाएं। इस ट्वीट ने भारत में एक नए विवाद को जन्म दे दिया और संपूर्ण भाजपा ने पुराना राग अलापना शुरु कर दिया। इस कड़ी में भाजपा की ओर से आरोप लगने शुरू हो गए कि राहुल गांधी देश में अव्यवस्था पैदा करना चाहते हैं और भारत को नेपाल बनाना चाहते हैं। लेकिन सच तो यह है कि बांग्लादेश और अभी हाल में नेपाल की घटना ने `तानाशाहों’ को सचेत कर दिया है तभी शायद अमित शाह ने एक मीटिंग में कह दिया कि १९७४ से लेकर २०१३ तक के आंदोलनों का अध्ययन किया जाए कि ये आंदोलन वैâसे हुए, इनके पीछे कौन सी शक्तियां थी तथा फिर ऐसा आंदोलन आगे बढ़ता है तो उससे वैâसे निपटा जाए। क्या उनके इस वाक्य से ऐसा नहीं लगता है कि भाजपा नेपाल की घटना से घबरा गई है?
कांग्रेस की विरासत!
अभी तक राहुल गांधी का राजनीति का एक तरीका दिखा है कि एक समय में वो किसी एक मुद्दे पर बोलना शुरू करते हैं और फिर लंबे समय तक उसी एक ही मुद्दे पर बोलते रहते हैं, वो चाहे भट्ठा पारसौल रहा हो या किसान बिल रहा हो या राफेल रहा हो या चौकीदार चोर का नारा रहा हो या फिर अडानी-अंबानी का मुद्दा रहा हो। आजकल भी वो सिर्फ एक मुद्दे तक ही सीमित हो गए हैं। जबकि कांग्रेस के पास आजादी से लेकर २०१४ तक के अपने तमाम कामों का बड़ा और मजबूत पुलंदा है। आजादी के बाद जहां कंगाल और बुरी तरह अव्यवस्थाओं से ग्रस्त देश मिला था, जिसके पास कुछ नहीं था, नाममात्र का बजट था, कुछ बनता नहीं था वहां देश को एक सूत्र में पिरोकर व्यवस्थित देश बनाने से लेकर सैकड़ों वो काम जो सरकारों में हुए और उसके कारण भारत इतनी बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया, दुनिया की बड़ी सैन्य ताकत, अंतरिक्ष की ताकत और विदेश नीति में बड़े से बड़े देश से बराबरी से व्यवहार करने वाला देश बन गया और साथ ही परमाणु शक्ति भी बन गया। बांग्लादेश कांग्रेस की एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर दर्ज है तो आज देश में जो भी योजनाएं हैं और जो कुछ भी निर्माण तथा प्रगति है वो कांग्रेस की बुनियाद पर खड़ा है। राहुल गांधी के पास बोलने और मुद्दा बनाने के लिए तमाम मुद्दे हैं। तमाम वो चीजें या योजनाएं भी हैं, जो कांग्रेस सरकारों ने शुरू किए और वर्तमान सरकार ने उनका नाम बदलकर नए कलेवर में पेश कर श्रेय लेने की कोशिश की है।

नेता विरोधी दल के रूप में राहुल गांधी के पास संसद में अपनी बात कहने तथा सरकार की नाकामियों का भंडाफोड़ करने का अच्छा खासा अवसर रहता है और इसमें दो राय नहीं कि वे इस अवसर का पुरजोर लाभ उठाने की कोशिश करते हैं लेकिन विपक्ष को अपना दुश्मन मानने की मानसिकता पालकर बैठी भाजपा एक योजनाबद्ध तरीके से उन पर हमलाबद्ध रहती नजर आती है। इसके बावजूद राहुल्ा गांधी जिन मुद्दों पर बोलते हैं उन मुद्दों पर भले ही गोदी मीडिया चर्चा करने से घबराती हो लेकिन सोशल मीडिया के जरिए यह आम लोगों तक पहुंच जाती है और इसका असर होता नजर आता है।
लफ्फाज भाजपा और राहुल!
२०१४ से पहले भी आरएसएस का संगठन था और भाजपा का भी लेकिन वो पूर्ण बहुमत की सरकार नहीं बना पाए। सरकार तब बनी जब आरएसएस और भाजपा ने पहले जे पी के आंदोलन में घुस कर सरकार पर धारदार हमला किया या उसके बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह के कंधे पर चढ़कर देश को एहसास करा दिया कि बोफोर्स में भ्रष्टाचार हुआ है और खुद राजीव गांधी इसमें शामिल हैं। इस बार भी एक ड्राइवर रहे अन्ना को ढूंढकर मीडिया का इस्तेमाल कर उन्हें गांधी से बड़ा बनाने की कोशिश कर ये सिद्ध करने का प्रयास किया कि कांग्रेस सरकार में कोई काम नहीं होता है तथा सिर्फ भ्रष्टाचार होता है और साथ ही साथ विनोद राय, श्री श्री, रामदेव सहित सभी का इस्तेमाल कर लिया लेकिन साथ ही देश को अच्छे अच्छे सपने भी दिखाए कि १५ लाख २ करोड़ रोजगार से लेकर महंगाई खत्म करने भ्रष्टाचार खत्म करने और अच्छे दिन लाने जैसे सैकड़ों वादे जनता तक पहुंचाने में कामयाब रहे। २०१४ का चुनाव तो इन्हीं सब हथकंडों से जीता। २०१९ में पुलवामा का रोल रहा तो वोट की हेराफेरी या चुनावी बेईमानी अभी आरोपों की प्राथमिकी के स्तर पर है पर सत्य सिर्फ ये है कि तीसरी बार भारत की सरकार बन गई और कई प्रदेशों में भी सरकार बना ली। संगठन के साथ पक्ष और विपक्ष में बनाया गया माहौल सरकारें बनाता हटाता है ये कांग्रेस, `इंडिया’ गठबंधन और राहुल गांधी को समझना होगा।
विरोधी से भी काफी कुछ सीखा जा सकता है। गुजरात के चुनाव में प्रधानमंत्री होने के बावजूद पचासों सभाएं और रोड शो करके मोदी पूरी ताकत झोंक देते हैं जीतने के लिए क्योंकि वो जानते हैं कि यदि गुजरात हार गए तो उनके नेतृत्व को चुनौती मिलने लगेगी। क्या राहुल गांधी उत्तर प्रदेश के लिए उसी तरह जूझ रहे हैं? इसी तरह छोटे चुनाव, उपचुनाव और यहां तक कि हैदराबाद नगर निगम के चुनाव में भाजपा ने अमित शाह और योगी आदित्यनाथ को उतार दिया था, छात्र संघों के चुनाव में भी भाजपा के बड़े लोग अपरोक्ष रूप से शामिल होते क्योंकि वो मनाते हैं कि हर चुनाव पूरे देश और प्रदेशों में मजबूत होने की बुनियाद बनता है जबकि कांग्रेस के बड़े नेता इन सबसे दूर ही रहते हैं। इसी तरह से भाजपा के कुछ बड़े से बड़े नेता और मंत्री अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए भले ही चुनाव के दौरान ही, सुलभ रहते हैं पर कांग्रेस में सर्वोच्च तीन-चार नेताओं से मिलकर अपनी बात कह पाना बड़े से बड़े नेताओं के लिए भी उतना आसान नहीं है।
क्या राहुल गांधी भी अपनी सरकारों के कामों को अपने हर भाषण और प्रेस कॉन्प्रâेंस में गिना रहे है? सवाल उठता है कि क्या राहुल गांधी सरकार को सभी तरह डिस्क्रेडिट करते हुए अपनी भविष्य की योजनाएं और जनता के लिए अपने इतिहास की बुनियाद पर भविष्य के सपने दिखा पा रहे हैं। ये सब बड़े सवाल हैं उनके सामने। वोट चोरी का मुद्दा सरकार पर प्रश्नचिह्न तो खड़ा कर देगा पर यदि चुनाव आयोग अपनी चाल पर ही कायम रहा तो जीत वैâसे होगी? उसका सिर्फ एक तरीका है जनता सरकार के खिलाफ पैâसला-कुन राह पकड़ ले और कांग्रेस तथा `इंडिया’ गठबंधन को भारी मात्रा में वोट कर दे तभी ये संभव है कि यदि कोई गड़बड़ हो भी रही है तो उसकी एक सीमा है और एक तरफ भारी मतदान उसकी भोथरा कर सकता है। इसके लिए जरूरी है कि राहुल गांधी एक विशुद्ध राजनीतिक टीम बनाए, मुद्दे तथा आलोचना और वादे तय करे और सिर्फ एक मुद्दे पर सीमित रहने के बजाय समग्रता से जनता को शिक्षित और प्रशिक्षित करे तथा सरकार के खिलाफ उसमें चेतना पैदा करे, यही वे मुद्दे हैं जिनपर सवार होकर राहुल गांधी जीत हासिल कर सकते हैं और भाजपा को कड़ी टक्कर देकर `इंडिया’ गठबंधन की सरकार बनाने में वे सफल हो सकते हैं।
राहुल की यह बात काबिले तारीफ है कि वे सत्ता की अंधी दौड़ में भाजपाई तरीके से साम-दाम-दंड-भेद का अंधानुकरण नहीं कर रहे हैं। भाजपा के उन हथकंडों से दूरी बनाए रखे हुए हैं, जिसमें विरोधी दल के राजनीतिक चेहरों पर व्यक्तिगत हमले किए जाते हैं। उनका चरित्र हनन करने के लिए किसी भी हद तक गिरने से संकोच नहीं किया जाता है। उनकी जिंदगी सेु जुड़ी घटनाओं पर तड़के लगाकर मसालेदार कहानियां परोसी जाती हैं। देश की पुरानी गंगा-जमुना तहजीब को तोड़ने की कोशिश में व्हॉट्सऐप यूनिवर्सिटी की ताकत झोंक दी जाती है। इतिहास के साथ की जा रही छेड़-छाड़ अब कोई नई बात नहीं रही है। राहुल के इस ईमानदारी और सौम्य रवैये के प्रति लोगों में अपनापन और झुकाव बढ़ता जा रहा है। बेशक यह बेदाग चरित्र कांग्रेस के लिए संजीवनी का काम करेगा!

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार – स्तंभकार हैं)

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