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द्वापर में श्रीकृष्ण, त्रेता में श्रीराम

शीतल अवस्थी

सनातन धर्म के अनुसार भगवान विष्णु सर्वपापहारी पवित्र एवं समस्त मनुष्यों को भोग तथा मोक्ष प्रदान करने वाले भगवान माने गए हैं। जब-जब इस धरती पर असुरों एवं राक्षसों का आतंक व्याप्त होता है, तब-तब भगवान विष्णु किसी न किसी रूप में अवतरित होकर पृथ्वी को पापमुक्त करते हैं। भगवान विष्णु ने अभी तक चौबीस अवतारों को धारण किया है। उनमें से अब तक बीस अवतारों की हम आपको जानकारी दे चुके हैं। जबकि विष्णुजी के इक्कीसवें और बाइसवें अवतार को सबसे महत्वपूर्ण माना गया है, यह है मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम और लीला पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण का अवतार।
विष्णुजी के इक्कीसवें अवतार हैं मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम। वैसे भगवान विष्णु के दस अवतार मानने वालों के आधार पर भगवान राम विष्णुजी के १० अवतारों में से सातवें हैं। राम, अयोध्या के राजा दशरथ और रानी कौशल्या के सबसे बड़े पुत्र थे। वैज्ञानिक तथा प्लेनिटेरियम सॉफ्टवेयर के अनुसार, राम जन्म ४ दिसंबर ७,३९३ ई. पूर्व हुआ था, यह गणना हिंदू कालगणना से मेल खाती है। भगवान राम बचपन से ही शांत स्वभाव के वीर पुरुष थे। उन्होंने मर्यादाओं को हमेशा सर्वोच्च स्थान दिया था। इसी कारण उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के नाम से जाना जाता है। त्रेतायुग में राक्षसराज रावण का बहुत आतंक था। उससे देवता भी डरते थे। उसके वध के लिए भगवान विष्णु ने राजा दशरथ के यहां माता कौशल्या के गर्भ से पुत्र रूप में जन्म लिया। इस अवतार में भगवान विष्णु ने अनेक राक्षसों का वध किया और मर्यादा का पालन करते हुए अपना जीवनयापन किया। पिता के कहने पर वनवास गए। वनवास के समय, रावण ने सीता का हरण किया था। रावण एक राक्षस तथा लंका का राजा था। रामायण के अनुसार, सीता और लक्ष्मण कुटिया में अकेले थे तब एक हिरण की वाणी सुनकर सीता परेशान हो गईं। वह हिरण रावण का मामा मारीच था। उसने रावण के कहने पर सुनहरे हिरण का रूप बनाया। सीता उसे देख कर मोहित हो गईं और श्रीराम से उस हिरण का शिकार करने का अनुरोध किया। श्रीराम अपनी भार्या की इच्छा पूरी करने चल पड़े और लक्ष्मण से सीता की रक्षा करने को कहा, मारीच श्रीराम को बहुत दूर ले गया। मौका मिलते ही श्रीराम ने तीर चलाया और हिरण बने मारीच का वध किया। मरते-मरते मारीच ने जोर से ‘हे सीता! हे लक्ष्मण!’ की आवाज़ लगाई, उसे सुन सीता ने चिंतित हो लक्ष्मण को श्रीराम का हाल जानने भेजा, पर अपनी भाभी की सुरक्षा हेतु लक्ष्मण जाने से पहले एक रेखा खींच गए, जो लक्ष्मण रेखा के नाम से प्रसिद्ध है। सीता के अकेले पड़ते ही रावण ने मौके का फायदा उठाया और उनका हरण कर लिया। सीता को को वापिस प्राप्त करने के लिए भगवान राम हनुमान और वानर सेना समेत सीता की खोज में लंका पहुंचे। वहां भगवान श्रीराम और रावण का घोर युद्ध जिसमें रावण मारा गया और उसके सभी बंधू-बांधवों और वंशजों का भी अंत हुआ। इस प्रकार भगवान विष्णु ने राम अवतार लेकर देवताओं को भय मुक्त किया।
फिर भगवान विष्णु ने द्वापरयुग में श्रीकृष्ण अवतार के रूप में बाइसवां अवतार लिया। भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण अवतार लेकर अधर्मियों का नाश किया। यह अवतार उन्होंने वैवस्वत मन्वन्तर के अट्ठाइसवें द्वापर में श्रीकृष्ण के रूप में देवकी के गर्भ से कंस के कारागर में लिया था। इनके पिता का नाम वसुदेव और माता का नाम देवकी था। भगवान श्रीकृष्ण ने इस अवतार में अनेक चमत्कार किए और दुष्टों का सर्वनाश किया। उन्होंने कर्मव्यवस्था को सर्वोपरि माना, कुरुक्षेत्र की रणभूमि में अर्जुन को कर्मज्ञान देते हुए उन्होंने गीता की रचना की जो कलिकाल में धर्म में सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है।
कंस का वध भी भगवान श्रीकृष्ण ने ही किया। संपूर्ण पृथ्वी दुष्टों एवं पतितों के भार से पीड़ित थी। उस भार को नष्ट करने के लिए भगवान विष्णु ने एक प्रमुख अवतार ग्रहण किया जो कृष्णावतार के नाम से संपूर्ण संसार में प्रसिद्ध हुआ। उस समय धर्म, यज्ञ, दया पर राक्षसों एवं दानवों द्वारा आघात पहुंचाया जा रहा था। महाभारत के युद्ध में अर्जुन के सारथी बने और दुनिया को गीता का ज्ञान दिया। धर्मराज युधिष्ठिर को राजा बना कर धर्म की स्थापना की। भगवान विष्णु का ये अवतार सभी अवतारों में सबसे श्रेष्ठ माना जाता है।

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