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जयदीप अहलावत का गाय के गोबर उठाने से लेकर 7 स्टार होटल की पार्टी का सफर

हिमांशु राज

जयदीप जब अपने जीवन के सफर को याद करते हैं तो उनकी आवाज़ में एक अजीब सी भावुकता झलक जाती है। वह कहते हैं कि कभी-कभी यकीन ही नहीं होता कि उन्होंने कहां से शुरुआत की थी और आज कहां तक पहुंच गए हैं। उनका बचपन कितनी सादगी और संघर्ष से भरा हुआ था इसकी झलक उनकी बातों में साफ दिखाई देती है। वह याद करते हैं कि किस तरह साल में बस एक जोड़ी जूते मिलते थे और गांव की नदी में तैरना उन्होंने गाय की पूंछ पकड़कर सीखा था। यह साधारण सा जीवन उनके लिए सबक की तरह था, जिसने उन्हें कभी हार न मानने और सपनों की ओर बढ़ते रहने का हौसला दिया।
मुंबई में अपने शुरुआती दिन भी जयदीप को उतने ही गहरे याद हैं। वह बताते हैं कि करीब पंद्रह साल उन्होंने एक छोटे से दो बीएचके अपार्टमेंट में गुजारे। जब अपना पहला घर खरीदा तो खुशी से ज्यादा उनके मन में यह ख्याल आया कि अगली बार और बड़ा घर लेना है। उनके मुताबिक यही इंसान का स्वभाव है, संतुष्टि हमेशा आगे से पुकारती है और इंसान अपने सफर को और ऊंचा करने की चाह रखता है।
गांव की अपनी दुनिया को वह बहुत अपनापन भरी याद के साथ जोड़ते हैं। वहां न कोई दिखावा था न कोई डर कि लोग क्या सोचेंगे। सब कुछ उतना ही सरल था जितना सुबह की धूप या मिट्टी की खुशबू। लेकिन मुंबई शहर का जीवन उनके लिए बिल्कुल अलग साबित हुआ। तेज़ रफ्तार, रोशनी और दौड़ती-दौड़ती यह दुनिया उनके गांव से बहुत भिन्न थी। पर जयदीप का मानना है कि उन्होंने दोनों पहलू करीब से देखे हैं-गांव में गोबर उठाने से लेकर सात सितारा होटलों की छत पर पार्टी करने तक। उनके लिए सफलता सिर्फ शान-शौकत का दूसरा नाम नहीं है, बल्कि एक अहसास है। अहसास इस बात का कि जहां से उन्होंने शुरुआत की थी, वहां की मिट्टी आज भी उनके भीतर जिंदा है। उनकी यह कहानी याद दिलाती है कि जीवन के हर मुकाम पर इंसान को अपनी जड़ों को कभी नहीं भूलना चाहिए।

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