पं. प्रेम बरेलवी
अमृत महोत्सव के साथ जीएसटी उत्सव की हकीकत कुछ और है, जबकि २०२५ के भारत की जमीनी हकीकत कुछ और है। सरकार एक तरफ जहां संविधान की रक्षा का दावा कर रही है, वहीं दूसरी तरफ दमन और हिंसा को हवा दे रही है। गुंडागर्दी की सारी ठेकेदारी ताकतवरों के संरक्षण में चल रही है। केंद्र और राज्य सरकारों के तहत पुलिस ब्रूटालिटी, कस्टोडियल मौतें और राजनीतिक गुंडागर्दी ने आम नागरिकों की जिंदगी को नरक बना दिया है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के २०२३ के आंकड़ों के अनुसार, अनुसूचित जनजाति (एसटी) समुदायों पर अत्याचार के मामलों में ८.७ प्रतिशत और अनुसूचित जाति (एससी) पर १.२ प्रतिशत वृद्धि हुई है। यूएस स्टेट डिपार्टमेंट की २०२४ ह्यूमन राइट्स रिपोर्ट में भारत में मनमानी हत्याएं होने के अलावा लोगों, खासकर महिलाओं के गायब होने और उन्हें टॉर्चर करने के आरोप लगाए गए हैं। इसके अलावा ग्लोबल टॉर्चर इंडेक्स २०२५ के अनुसार, २०२२ में ही १,९९५ वैâदियों की न्यायिक हिरासत में मौत हुई, जिनमें १५९ अस्वाभाविक थीं और ६१ मानवाधिकार कार्यकर्ता हिरासत में थे। एनसीआरबी के २०२२ डेटा के अनुसार, हिरासत में १,००० से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी। ये आंकड़े केवल संख्याएं नहीं, बल्कि हजारों परिवारों की चीखें हैं। ह्यूमन राइट्स वॉच की २०२५ वर्ल्ड रिपोर्ट में नरेंद्र मोदी की तीसरी सरकार के दौरान दमन को जारी बताया गया है। क्या यह वही भारत है, जिसमें अमृत-काल चल रहा है?
नतमस्मक विश्वगुरु!
सरकारी अत्याचार का चरम पुलिस ब्रूटैलिटी में दिखता है। २०२० से लेकर २०२४ तक किसानों पर अत्याचार से लेकर सितंबर, २०२५ में बिहार के पटना में टीआरई-४ परीक्षा के खिलाफ छात्रों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया, जिसका वीडियो वायरल हो गया। एनडीटीवी इंडिया के अनुसार, दर्जनों विद्यार्थी घायल हुए। इसी तरह अगस्त, २०२५ में दिल्ली में एसएससी परीक्षा घोटाले के खिलाफ प्रदर्शनकारियों पर पानी की बौछारें और लाठियां बरसाई गर्इं, जहां युवा न्याय की गुहार लगा रहे थे। उत्तर प्रदेश में तो यह दमन सांप्रदायिक रंग ले लेता है। अगस्त, २०२५ में बरेली के सात मुस्लिम युवकों को पुलिस ने घरों से खींचकर हिरासत में लिया, जहां उन्हें पीटा, बिजली के झटके दिए और यातनाएं दीं। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इसकी जांच के आदेश दिए। महाराष्ट्र के कोथरुड केस में एससी समुदाय पर पुलिस का युद्ध चल रहा है, जहां ऑल इंडिया इंडिपेंडेंट शेड्यूल्ड कास्ट्स एसोसिएशन ने ८ अगस्त, २०२५ को बयान जारी किया। जुलाई, २०२५ में त्रिपुरा में सीपीएम ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर राजनीतिक गुंडागर्दी का आरोप लगाया, जहां पुलिस निष्क्रिय रही। उत्तर प्रदेश में इस बार तो कांवड़ यात्रा के नाम पर खुली हिंसा का तांडव कई दिन चला। दिल्ली में अगस्त, २०२५ में तृणमूल सांसद मिताली बाग पर पुलिस ने हमला किया, जिसे भाजपा सरकार का अत्याचार बताया गया।
कस्टोडियल मौतें तो और भी भयावह हैं। जुलाई, २०२५ में तमिलनाडु के चेन्नई में एक्टर-पॉलिटिशियन विजय ने अजीत कुमार की पुलिस हिरासत में मौत के खिलाफ विशाल रैली निकाली। यह घटना राज्य सरकार पर राजनीतिक दबाव बना रही है। आंध्र प्रदेश में जुलाई, २०२५ में वाईएसआरसीपी कार्यकर्ता का पुलिस ने सिर फोड़ दिया और जगन मोहन रेड्डी को अस्पताल जाने से रोका गया। गुजरात में जून, २०२५ में एक वीडियो वायरल हुआ, जहां पुलिस ने निर्दोष को पीट रही है। लद्दाख में एक जवान और एक छात्र की हत्या, उत्तराखंड में एक सरकारी अस्पताल की बदहाली दिखानेवाले पत्रकार की धमकियों के बाद संदिग्ध मौत, उत्तर प्रदेश में हर दिन दर्जनों हत्याएं, भाजपा नेताओं की रेप की वायरल क्लिप, उपराष्ट्रपति धनखड़ का संदेह भरा कार्यकाल से पहले इस्तीफा और फिर अचानक उनका नए उपराष्ट्रपति के चुने जाने तक नजरबंद रहना, अमेरिका और चीन के आगे सरकार का नतमस्तक रहना, क्या ऐसी घटनाएं भारत को विश्वगुरु बनाती हैं? सरकारें कुछ मामलों की जांच आवाज उठने पर करती तो हैं, लेकिन अपराधियों को सजा कम ही मिलती है।
रामराज्य के नाम पर…
राजनीतिक हिंसा भी भारत में चरम पर है। नेता खुलेआम लोगों को धमकियां देते हैं। राहुल गांधी को सीधे जान से मारने की धमकी और उसके बाद भी भाजपा सरकारों द्वारा धमकी देने वाले के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करना बताता है कि अपराधी सत्ता की शह पर ही काम कर रहे हैं। इस सत्ता संरक्षण ने भारत को अराजकता की ओर धकेल दिया है। सांप्रदायिक गुंडागर्दी भी चरम पर है। मई, २०२५ में सोनी सोरी केस की याद ताजा हुई, जहां छत्तीसगढ़ पुलिस ने आदिवासी कार्यकर्ता को यौन प्रताड़ित किया और दोषी अधिकारी को राष्ट्रपति पदक मिला। मणिपुर लगभग दो साल से ज्यादा सुलगाया गया। मणिपुर और असम में जुलाई, २०२५ में सैन्य हिंसा बढ़ी, जहां भाजपा सरकार से वैश्विक जवाबदेही की मांग हुई। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने १३ अक्टूबर, २०२५ को कहा कि छोटी बातों पर गुंडागर्दी न करें और जब मणिपुर बर्बाद हो गया तो प्रधानमंत्री मोदी मणिपुर के नाम में मणि ढूंढने निकले। अर्थात् जख्मों पर मजाक का नमक डालने का काम करके आए, लेकिन आंकड़े तो झूठ नहीं बोलते।
मिनिस्ट्री ऑफ होम अफेयर्स के मार्च २०२५ डेटा के अनुसार, देश में नरेंद्र मोदी के ११ साल के शासनकाल में अल्पसंख्यकों, दलितों, आदिवासियों, महिलाओं, आवाज उठानेवालों, किसानों और विद्यार्थियों पर हिंसा और सरकारी अत्याचार के मामले बढ़े हैं। ये अत्याचार और गुंडागर्दी नहीं तो और क्या है? कारण साफ हैं, भाजपा सरकारें विपक्ष को कुचलने के लिए पुलिस का दुरुपयोग कर रही हैं, अपनी पूर्ववर्ती सरकारों से कहीं ज्यादा। बढ़ती आर्थिक असमानता की पोल जीएसटी वसूली ने खोल दी है, जिसको बड़े सुनियोजित तरीके से केंद्र सरकार ने कम करने का नाटक करके जीएसटी बचत उत्सव में बदल दिया है। लेकिन अमीरों से मात्र तीन प्रतिशत जीएसटी और गरीबों से ६४ प्रतिशत जीएसटी और मध्यम वर्ग से ३३ प्रतिशत जीएसटी वसूली के आंकड़े वह नहीं छिपा सकी। २० प्रतिशत बेरोजगार युवाओं के साथ लगातार बढ़ती बेरोजगारी भी केंद्र सरकार के अमृतकाल का एक नमूना है, जहां रोजगार मांगनेवाले पुलिस की लाठियां खा रहे हैं। सांप्रदायिक ध्रुवीकरण ने आग लगानेवाले कह रहे हैं कि देश में राम राज्य है। लेकिन यह कैसा राम राज्य है, जहां किसानों और जवानों से लेकर आम आदमी तक कोई भी सुरक्षित नहीं है, सिवाय उनके, जो सरकार या नरेंद्र मोदी की चरणवंदना करने में लगे हैं। ऐसा लगता है कि अपने अधिकारों की आवाज उठानेवाले निर्दोषों की गिरफ्तारी और अपराध करनेवालों को सुविधा देने का सरकारी युग चल रहा है। इसे लोकतांत्रिक नहीं, तानाशाही युग ही कहा जाएगा, जहां एक भी उठा हुआ सिर सुरक्षित नहीं है, लेकिन इस सबके लिए जिम्मेदार लोगों को इतिहास माफ नहीं करेगा।
(लेखक सम-सामयिक विषयों के विश्लेषक हैं)
