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गपशप…भयंकर बाढ़ २०२५ : आसमानी का बहाना…सुल्तानी की बहार

राजन पारकर

महाराष्ट्र में मानसून का आगमन सिर्फ बादलों का नहीं, बल्कि घोषणाओं का भी मौसम लेकर आता है। सरकार पूरी तरह तैयार है!, प्रशासन मुस्तैद है!, बांध बिल्कुल सुरक्षित हैं! ये जानी-पहचानी घोषणाएं हर साल बादलों के साथ गूंजती हैं और फिर कुछ ही दिनों में वही शासन व्यवस्था पानी में तैरती नजर आती है। सन् २०१४ में ही टेरी (दी एनर्जी एंड रिसोर्सेस इंस्टीट्यूट) ने सरकार को जलवायु परिवर्तन को लेकर ऐसी भविष्यवाणी सौंपी थी कि पढ़ते ही किसी के भी माथे पर पसीना छलक आए। सूखे-बाढ़ की तीव्रता और आवृत्ति में बढ़ोतरी, फसलों पर कीट-रोगों का प्रकोप, तापमान में अचानक बदलाव, कम समय में मूसलाधार बारिश, वर्षा के बीच बढ़ते अंतराल… इतने स्पष्ट संकेतों के बावजूद पिछले ग्यारह सालों में राज्य सरकार की तैयारी ऐसी रही मानो जरूरत पड़ते ही बाड़ को बारिश में भिगोना। जलवायु परिवर्तन अब सरकार का ऐसा रामबाण बहाना बन चुका है, जो हर रोग में फिट बैठता है।
 बाढ़ आई? जलवायु परिवर्तन!
 बांध टूटने की नौबत? जलवायु परिवर्तन!
 नदी किनारे अतिक्रमण? जलवायु परिवर्तन!
 और सरकार की जिम्मेदारी? हमारा क्या, बादल आएंगे तो पानी बरसेगा ही!
ऐसा लगता है मानो राज्य के हाकिमों ने प्रशासन चलाना छोड़कर मानसून चलाने का बीड़ा उठा लिया है!
श्वेतपत्र या शुभंकरती?
असल सवाल यही है- २०१४ से २०२५ तक राज्य सरकार ने आखिर कौन-कौन से ठोस कदम उठाए? जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए नीतियां बनीं या सिर्फ प्रेस नोट छपे? बांधों के संचालन के नियमों का पालन हुआ या योजनाओं पर गोदाम की धूल जमती रही? नदी प्रबंधन सुधरा या नदी को ही मुख्य कार्यकारी अधिकारी बना दिया गया? बाढ़ आते ही आपदा प्रबंधन नाम का एक शानदार नाट्य मंच तैयार हो जाता है।
कुछ दिन हेलिकॉप्टर, रबर बोट, मंत्री और माइक का मेला; फिर तालियों की गड़गड़ाहट;
और फिर कुछ हफ्तों में महाबाढ़ पर समिति का गठन। वो समिति रिपोर्ट बनाती है और सरकार अगले मानसून की बाट जोहती नजर आती है। बांध सुरक्षित, पर नीति धुंधली बाढ़ के दौरान प्रशासन ने जन-जीवन बचाने के लिए जो सराहनीय काम किए, वो निश्चित ही प्रशंसा के पात्र हैं, लेकिन बांध प्रबंधन, सिंचाई कानून का पालन, नदी में हो रहे अवैध अतिक्रमण पर कार्रवाई-इन पर आते ही सरकार मौनव्रत धारण कर लेती है। जैसे मानो नदी ने खुद सरकार को अनापत्ति प्रमाणपत्र दे दिया हो। आप कुछ मत कीजिए, बाढ़ लाना और दोष लेना मेरा काम है!
आसमानी का बहाना और सुल्तानी की गड़बड़
हां, आसमानी आपदाओं के सामने इंसान की क्षमता सीमित होती है, लेकिन सुल्तानी गड़बड़ी? वो तो पूरी तरह हमारे हाथ में है न!
बांधों का संचालन जलवायु पर नहीं, इंसानी दिमाग पर निर्भर करता है। कानूनों का पालन बादलों पर नहीं, प्रशासन की इच्छाशक्ति पर टिका है, लेकिन यहां तो हाल ये है कि सरकार ने जलवायु परिवर्तन को ही मुख्य सचिव नियुक्त कर दिया है और खुद सलाहकारों के साथ मानसूनी मीटिंग्स में मग्न है।
श्वेतपत्र की घड़ी आ चुकी है
पिछले ग्यारह वर्षों में जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए सरकार ने वास्तव में क्या किया? कौन-सी योजनाएं लागू हुर्इं, कौन से पैâसले लिए गए और कौन से सिर्फ फाइलों में धूल खाते रहे। इस पर एक पारदर्शी श्वेतपत्र जारी करने का वक्त आ गया है। ये श्वेतपत्र महज आंकड़ों की रिपोर्ट न होकर सरकार की नाकामी का दर्पण होना चाहिए। सरकार को जलवायु परिवर्तन को बहाना बनाने के बजाय अपने निर्णयों, कमियों और विफलताओं का बारिश जैसा पारदर्शी लेखा-जोखा जनता के सामने रखना चाहिए।
आखिर में बस इतना ही…
बाढ़ आती है तो सरकार को याद आता है जलवायु परिवर्तन, सूखा पड़ता है तो याद आता है भगवान और जनता को रोज याद आती है सरकारी नाकामी। जलवायु परिवर्तन आसमानी हो सकता है, लेकिन उसकी तैयारी, नीतियां, नदी प्रबंधन ये सब सुल्तानी मसले हैं और सुल्तानी का मुकाबला घोषणाओं से नहीं, इच्छाशक्ति से होता है! यह लेख श्री प्रदीप पुरंदरे के २०२५ बाढ़ विषयक अवलोकनों पर आधारित व्यंग्यात्मक शैली में लिखा गया है।

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