द्विजेंद्र तिवारी मुंबई
पिछले दिनों दो खबरें सोशल मीडिया पर खूब चर्चा में रहीं, क्योंकि मुंबई सहित राज्य के सभी स्थानीय निकायों के चुनाव होने हैं। इनमें सबसे पहले बात उस चर्चा की जिसमें मुंबई और दुबई की सड़कों का तुलनात्मक विश्लेषण किया गया। सोशल मीडिया की इन चर्चाओं का सार यह था कि मुंबई में सड़कें इतनी खराब क्यों हैं। केवल दुबई ही नहीं, सिंगापुर सहित कई शहरों में जबरदस्त इच्छाशक्ति से शहरों का कायाकल्प कर दिया गया। देश के छोटे बड़े सभी शहरों में लगभग ५२ करोड़ लोग रहते हैं। शहरीकरण की यही रफ्तार रही तो बीस वर्ष में यह आबादी ९० करोड़ और मुंबई में आबादी ३ करोड़ तक पहुंच सकती है।
मुंबई और दुबई की दौलत
जुलाई २०२५ तक मुंबई का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) ४०० अरब डॉलर से अधिक हो गया है, जो पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों की जीडीपी के करीब है। यह उपलब्धि इसे दक्षिण एशिया में अग्रणी वित्तीय और वाणिज्यिक केंद्र के रूप में स्थापित करता है। यह वृद्धि वित्त, व्यापार, रियल एस्टेट, सूचना प्रौद्योगिकी और मनोरंजन जैसे क्षेत्रों में इसके मजबूत प्रदर्शन के कारण संभव हुआ है।
दूसरी तरफ दुबई का सकल घरेलू उत्पाद २०२५ की पहली तिमाही में ११६ अरब डॉलर रहा। दुबई भूमि क्षेत्रफल के हिसाब से मुंबई से बड़ा शहर है, जिसका क्षेत्रफल लगभग ७०० वर्ग किमी है, जबकि मुंबई का क्षेत्रफल लगभग ६०० वर्ग किमी है। मुंबई दो करोड़ से ज्यादा की आबादी के साथ काफी ज्यादा आबादी वाला शहर है, जबकि दुबई की आबादी लगभग ३८ लाख है।
इस तरह देखें तो मुंबई के पास अपना इंफ्रास्ट्रक्चर सुधारने के लिए दुबई से कम पैसा नहीं है। कल्पना कीजिए कि यहां सड़क और इंफ्रास्ट्रक्चर पर ध्यान दिया जाए तो क्या करिश्मा हो सकता है। लेकिन वर्षों से राजनीतिक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी से सारी व्यवस्था चरमरा चुकी है। यह बहाना नहीं बनाया जा सकता कि आबादी ज्यादा होने से विकास प्रभावित हो रहा है।
पुणे की चर्चित सड़क
दूसरी वायरल हो रही कहानी पुणे के जंगली महाराज (जेएम) रोड की है, जो लगभग चार दशकों तक गड्ढों से मुक्त रही। इस कहानी को इंस्टाग्राम, फेसबुक और यूट्यूब जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर गुणवत्तापूर्ण इंजीनियरिंग के एक बेहतरीन उदाहरण के रूप में खूब शेयर किया गया है। इस सड़क का निर्माण १९७६ में मुंबई स्थित दो पारसी भाइयों द्वारा संचालित फर्म रेकोंडो ने किया था। उस समय, उन्होंने उन्नत ‘हॉट मिक्स’ डामर तकनीक का इस्तेमाल किया था जो भारत में नई थी। ठेकेदारों को अपने काम पर इतना भरोसा था कि उन्होंने पुणे महानगर पालिका को दस वर्ष की लिखित गारंटी दी थी, जिसमें किसी भी समस्या के आने पर सड़क की मुफ्त मरम्मत का वादा किया गया था। यह सड़क अपनी वारंटी अवधि से भी अधिक ४० वर्षों तक चली और ज्यादातर बड़ी दरारों और गड्ढों से मुक्त रही। अपनी सफलता के बावजूद, रेकोंडो को काली सूची में डाल दिया गया और मनपा ने उन्हें उसके बाद कोई और सड़क परियोजना नहीं दी। यह विवरण एक किंवदंती का हिस्सा बन गया है और कई लोगों का अनुमान है कि यह अन्य ठेकेदारों के ‘मरम्मत टेंडरों’ की रक्षा के लिए किया गया था।
इच्छाशक्ति की कमी
अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ. कैनेडी से पूछा गया कि क्या अमीर देश होने के कारण वहां की सड़कें अच्छी हैं। तब वैâनेडी ने जग प्रसिद्ध बयान दिया, ‘अमेरिकी सड़कें इसलिए अच्छी नहीं हैं, क्योंकि अमेरिका समृद्ध है, बल्कि अमेरिका इसलिए समृद्ध है क्योंकि अमेरिकी सड़कें अच्छी हैं।’
भारत के सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी अपने देश की बुनियादी ढांचा योजनाओं पर चर्चा करते समय अक्सर इस उद्धरण का उल्लेख करते हैं।
भारत के आर्थिक इंजन मुंबई की इस बदहाली के कारण कई उद्योग बाहर जा रहे हैं। उसके साथ ही कई उद्योगपति दुबई और सिंगापुर में अपना मुख्यालय बना रहे हैं। नदी नाले भी नहीं बच रहे हैं और वहां अवैध निर्माण हो रहे हैं। यह सब एक दिन में नहीं होता। मुंबई को नुक़सान पहुंचाने वाली इस लापरवाही से आगे और भी विकट स्थिति पैदा हो सकती है।
(लेखक कई पत्र पत्रिकाओं के संपादक रहे हैं और राजनीतिक मामलों के जानकार हैं)
