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मुस्लिम वर्ल्ड : ट्रंप के लाख प्रतिबंध भी ना रोक पाएंगे?.. ईरान के तेल का पूरा खेल

सूफी खान

प्रेसिडेंट ट्रंप के फरमान को दरकिनार करते हुए क्या चीन ईरान से गुपचुप तरीके से तेल खरीद रहा है? जी हां, एक बड़े अमेरिकी अखबार ने विभिन्न देशों से जुड़े सूत्रों के हवाले से यह दावा किया है। रिपोर्ट में बताया गया कि अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद चीन एक तरह के ‘बार्टर सिस्टम’ के तहत ईरान के साथ बाकायदा कारोबार कर रहा है। बार्टर सिस्टम का अर्थ होता है सामान के बदले सामान खरीदना। कहा जा रहा है कि इस तरीके से चीन, ईरान से तेल ले रहा है और इसके बदले में वहां कई इंप्रâास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है।
रिपोर्ट के मुताबिक, इस बार्टर सिस्टम के तहत ईरानी तेल की खेप चीन भेजी जाती है और बदले में चीन की सरकारी कंपनियां ईरान में सड़क, पुल और दूसरी ढांचागत परियोजनाएं बनाती हैं।
अमेरिकी अखबार ने सूत्रों के हवाले से बताया कि पिछले साल इसी बार्टर सिस्टम के माध्यम से लगभग ८.४ अरब अमेरिकी डॉलर का तेल ईरान ने चीन को दिया, जिसकी एवज में चीनी प्रोजेक्ट्स की फंडिंग की जा रही है वहां।
इससे पहले अगस्त में अमेरिका के एक न्यूज चैनल ने भी दावा किया था कि चीन अमेरिकी प्रतिबंधों को दरकिनार करने के लिए ‘शैडो फ्लीट’ के जरिए ईरान से चुपचाप तेल मंगा रहा है। यह ऐसा गुप्त जहाजी बेड़ा होता है, जिसमें बताया तो कुछ और जाता है, लेकिन अंदर माल कुछ और ही भरा होता है। आरोप तो ये भी लगता है कि जहाज पर किसी और देश का झंडा लगाकर भी अमेरिका को भ्रमित किया जाता है।
जानकार बताते हैं कि ईरान के तेल कारोबार का पूरा तंत्र बेहद संगठित, रणनीतिक और टेक्नोलॉजिकल रूप से उन्नत है। चीन के झोउशान, किंगदाओ और चांगझोउ जैसे बंदरगाह इस नेटवर्क के हिस्से हैं, जो ईरानी तेल को गुप्त तरीकों से रिफाइन और ट्रांसपोर्ट करते हैं। बिचौलिए अक्सर इस तेल को मल्टीपल सोर्स से आया दिखाकर सिंगापुर, मलेशिया और इंडोनेशिया के रास्ते चीन पहुंचाते हैं। इस पूरे रूट में मालदीव, जोहोर जलडमरूमध्य और सुमात्रा जैसे सामरिक स्थानों का उपयोग होता है। इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि ईरान अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों से बचने के लिए ‘शिप टू शिप ट्रांसफर’, ‘फ्लैग स्विचिंग’ और ‘ट्रैकिंग बंद’ करने जैसी तकनीकों का उपयोग करता है। ट्रंप ईरान को आर्थिक रूप से घुटने पर लाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन हकीकत ये है कि तेल की मांग, राजनीतिक हित और भौगोलिक लोकेशन ने मिलकर ईरान के तेल तंत्र को लगभग अजेय बना दिया है। चीन को सस्ती कीमत पर मिलने वाला ईरानी तेल न सिर्फ बीजिंग के लिए फायदेमंद है, बल्कि यह अमेरिका के प्रतिबंधों की प्रभावशीलता पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
ईरान ने साल २०१५ में अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, प्रâांस, चीन और रूस के साथ परमाणु समझौते पर दस्तखत किए थे। इस समझौते के तहत ईरान को न्यूक्लियर प्रोग्राम पर रोक लगाने के बदले प्रतिबंधों में राहत दी गई थी। लेकिन मई २०१८ में ट्रंप ने अपने पिछले कार्यकाल में अमेरिका को इस समझौते से बाहर कर लिया, क्योंकि ये समझौता ओबामा के दौर में हुआ था। उन्होंने ईरान पर फिर से सख्त प्रतिबंध लगा दिए। इसके जवाब में ईरान ने भी समझौते के तहत अपनी प्रतिबद्धताएं धीरे-धीरे छोड़ दीं और आरोप लगता है कि न्यूक्लियर एनरिचमेंट पर फिर से काम शुरू कर दिया था।

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