मानव शरीर में ‘आंख’ सबसे महत्वपूर्ण अंगों में गिनी जाती। उसके न होने से दुनिया बेरंग होती है। विश्व का हर पांचवा व्यक्ति नेत्र संबंधित विभिन्न समस्याओं से ग्रस्त हैं। कम उम्र में आंखों की रोशनी का कमजोर पड़ना, आम बात हो गई है। आंखों की रक्षा और सुरक्षा को ध्यान में रखकर आज समूचे संसार में खास दिवस मनाया जा रहा है। सालाना 9 अक्टूबर को मनाए जाने वाला ‘विश्व दृष्टि दिवस’ एक विश्वस्तरीय वैश्विक कार्यक्रम है जो नेत्र स्वास्थ्य के महत्व के बारे में जागरूकता बढ़ाने और गुणवत्तापूर्ण नेत्र देखभाल की सार्वभौमिकता को दर्शाता है। ये दिन प्रत्येक साल अक्टूबर के दूसरे गुरुवार को मनता है। इसकी शुरुआत मूलरूप से वर्ष-2000 में ‘लायंस क्लब इंटरनेशनल फाउंडेशन’ के ‘साइट फर्स्ट कैंपेन’ के जरिए हुई थी।
डब्ल्यूएचओ के आंकड़ों की माने तो विश्व में सालाना 54 करोड़ लोग नेत्र समस्याओं से घिरते हैं। इनमें 47 फीसदी ऐसे मरीज हैं, जिनकी आंखों की रौशनी तकरीबन-तकरीबन जा चुकी होती है। वक्त से पहले आंखों की रोशनी क्यों जवाब दे रही हैं? उसकी असल वजह से भी हम सभी वाकिफ हैं। दरअसल, आज के समय में बड़ों से लेकर छोटे-छोटे बच्चे तक दिनभर मोबाइल, लैपटॉप और टीवी स्क्रीन में चिपके रहना आंखों को सीधे-सीधे नुकसान पहुंचाना होता है। नेत्र चिकित्सक बताते हैं कि लंबे वक्त तक स्क्रीन पर समय बिताने से रेटिना पर अतिरिक्त भार पड़ता है। स्क्रीन देखने से आंखों में सूखापन, धुंधलापन और सिरदर्द जैसी समस्याएं होती हैं जिसे डिजिटल आई स्ट्रेन भी कहते हैं। इससे बचने के लिए हर 20 मिनट में 20 सेकंड का ब्रेक लेना चाहिए और 20 फीट दूर किसी चीज देखने की कोशिश करना चाहिए, यही सभी बातें आज नेत्र दिवस के मौके पर जागरूकता के तौर पर विशेषज्ञों द्वारा बताई जाएंगी।
नेत्रदान की ओर भी जागरूकता बढ़ानी होगी। क्योंकि भारत में इस समय 90 लाख से ज्यादा मरीज कार्नियल ब्लाइंड की समस्या से जूझ रहे हैं। नेत्रदान कम होने की वजह से लोगों की आंखों की रौशनी लौटाने में दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। जबकि, इस क्षेत्र में अमेरिका जैसे देश में नेत्रदान सबसे ज्यादा होता है। वहां अन्य देश को जरूरत पड़ने पर किसी मरीज की आंखों की रोशनी लौटाने के लिए ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया में सबसे ज्यादा कार्निया दिए जाते हैं। अमेरिका में ऐसा कानून है कि किसी भी व्यक्ति की मौत के बाद फौरन उनके परिजनों से संपर्क कर नेत्रदान की प्रक्रिया को पूरा किया जाता है। ऐसा कानून भारत में भी बनना चाहिए।
स्पेन आधुनिक तकनीक और कुशल पेशेवरों द्वारा समर्थित अपनी उन्नत नेत्र चिकित्सा देखभाल के लिए प्रसिद्व है। हर साल बड़ी संख्या में नेत्र शल्य चिकित्सा करता है, जिसमें मोतियाबिंद हटाना और लेसिक जैसी अपवर्तक प्रक्रियाएँ शामिल हैं। स्पेन से दूसरे देशों को सीखने की जरूरत है। हालांकि, भारत में शंकर नेत्रालय सबसे बड़े आई केयर हॉस्पिटल्स में से एक है। मोतियाबिंद सर्जरी और रेटिनल समस्याओं जैसी आंखों की बीमारी के जटिल मामलों का इलाज करता है। इस अस्पताल को भारत के सर्वश्रेष्ठ चैरिटेबल अस्पतालों में से एक का टैग प्राप्त है।
भावी पीढ़ियों की दृष्टि की रक्षा करने में हुकूमतों के अलावा अभिभावकों को भी महती भूमिकाएं निभानी हांगी। साथ ही सरकारों को नेत्र स्वास्थ्य सेवाएं सभी के लिए सुलभ, उपलब्ध और किफ़ायती बनाने पर विचार करना चाहिए। बच्चों में दृष्टि दोष होने से उनकी शिक्षा और सामाजिक समावेशन पर बुरा असर पड़ता है, पिछले साल मई 2024 में, विश्व स्वास्थ्य संगठन ने गुणवत्तापूर्ण, किफ़ायती चश्मे और उनसे जुड़ी जन-केंद्रित सेवाओं को ज़रूरतमंदों तक पहुंचाने के लिए वैश्विक मंच एक पहल हुई जिसमें 98 देशों ने भाग लिया, मंच पर तय हुआ कि सभी देश रौशनी लौटाने के लिए नेत्रदान पर जोर देंगे। अगली सभा 2030 में की जाएगी।
डॉ. रमेश ठाकुर
