हिमांशु राज
एटा की सियासत इन दिनों बृजभूषण शरण सिंह की मौजूदगी से गर्म है। ४ अक्टूबर २०२५ को हुई अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा की रैली में उनकी शिरकत ने प्रदेश के राजनीतिक तापमान को और बढ़ा दिया। वजह साफ है, योगी आदित्यनाथ सरकार ने उत्तर प्रदेश में जाति-आधारित समारोहों और रैलियों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने का आदेश दे रखा है। ऐसे में विवादित पृष्ठभूमि के बीच यह मंचन न केवल प्रशासन के आदेशों की कसौटी पर था, बल्कि राजनीतिक संदेशों का गहरा पहाड़ा भी पढ़ा रहा था।
रैली में बृजभूषण शरण सिंह का अंदाज आक्रामक था। उन्होंने विपक्ष पर सीधा वार करते हुए कहा कि वे किसी जातिगत एजेंडे के तहत काम नहीं करते, बल्कि सर्व समाज के लिए उनके दरवाजे हमेशा खुले हैं। विपक्षियों पर आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा कि असली जातिगत जहर वही पैâला रहे हैं, जबकि उनका उद्देश्य समाज के हर वर्ग को साथ लेकर चलना है। यह लाइन जनता में तालियां बटोरने के साथ-साथ सियासी मोर्चे पर उनके रुख को स्पष्ट करने का प्रयास थी।
दूसरी ओर योगी सरकार का आदेश बिल्कुल साफ है, पुलिस रिकॉर्ड, सरकारी फाइलों और सार्वजनिक स्थलों पर जाति का उल्लेख बंद हो, जातिगत रैलियां और समारोह शून्य स्तर पर हों। सरकार की मंशा है कि जातीय राजनीति की पुरानी आदतों को तोड़ा जाए और चुनावी समीकरणों में इस संवेदनशील मुद्दे का इस्तेमाल कम हो। लेकिन बृजभूषण शरण सिंह की इस रैली में मौजूदगी ने एक सवाल खड़ा कर दिया कि क्या यह प्रशासनिक आदेशों की सीमा की परख थी या फिर आने वाले चुनावी मौसम की आहट में अपनी सामाजिक जड़ों को सींचने का तरीका? विपक्ष ने इसे तुरंत भुनाया। आरोप लगाया कि भाजपा के नेता ही आदेशों को ताक पर रखकर जातीय ध्रुवीकरण की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने तंज कसा कि ‘सर्व समाज की बात मंच से और चुनावी बही-खाते में जातीय जोड़-घटाव की कवायद’ भाजपा का असली चेहरा दिखाती है। दूसरी तरफ भाजपा समर्थकों का तर्क है कि बृजभूषण शरण सिंह की उपस्थिति महज एक सामाजिक कार्यक्रम में सहभागिता थी, इसमें जातीय राजनीति का कोई रंग तलाशना विपक्ष की घबराहट है। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह मामला आने वाले महीनों में बड़ा नैरेटिव बन सकता है। एक ओर योगी सरकार जाति आधार को कमजोर करने की नीति पर है, दूसरी ओर पार्टी के ही कुछ नेताओं की इस तरह की गतिविधियां उस नीति की साख पर सवाल खड़े करती हैं। नतीजतन, बृजभूषण शरण सिंह का यह कदम सिर्फ एटा की रैली तक सीमित नहीं, बल्कि यह आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों के जाति बनाम विकास बहस का शुरुआती संकेत भी है।
