नित नई आशा ले कर
आता स्वर्णिम सवेरा
तमस निराशा की हरता
तब दिखता जग सुनहरा
उल्लास भरता मन के भीतर
कदम उठाता तब तू गहरा
प्रतिदिन संज्ञान नया मिलता
तभी दिवस सार्थक हो जाता
प्रभु भक्ति सी हे जन सेवा
सबसे मिलता आशीषों का मेवा
मन के विकार धुल जाते
मिलता जब ज्ञान घनेरा
जिस दिन समभाव मन में आता
धनी निर्धन एक सा हो जाता
ज्ञानी अज्ञानी का भेद न करे
ऊंच नीच का अंतर न खोजें
संपूर्ण मानवता को एक ही माने
प्रकृति नहीं करती भेदभाव
इस मूलमंत्र को गांठ में बांधे
कर्म होंगे तेरे सदा ही नेक
मिलेंगे आशिर्वाद अनेकानेक।
-बेला विरदी
