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महाराष्ट्रनामा : ‘कागजों में किसान, फाइलों में इंसान और अफवाहों में गैस-‘व्यवस्था पुराण’!’

-‘अन्नदाता बोता है उम्मीद, बाजार बो देता है धोखा!’

राजन पारकर

बारिश आते ही किसान खेत की ओर निकल पड़ा। हाथ में मेहनत की ताकत और आंखों में अच्छी फसल का सपना। लेकिन इसी सपने की कीमत वसूलने के लिए कुछ लोग नकली बीज और मिलावटी खाद का जाल बिछाकर बैठ जाते हैं। किसान मिट्टी में बीज डालता है, मगर उसे क्या पता कि दुकान से खरीदा हुआ बीज फसल देगा या सिर्फ धोखे की खेती करेगा। विधानसभा में मांग उठी कि ऐसे नकली बीज-खाद विक्रेताओं पर मकोका जैसी कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। सवाल यही है कि किसान को लूटनेवालों पर कार्रवाई की फसल कब उगेगी? क्योंकि यहां अजीब स्थिति है- किसान असली मेहनत करता है, लेकिन कुछ लोग नकली सपने बेचकर असली पैसा कमाते हैं।
‘सरकारी कागजों की कलम चली, तो जिंदा आदमी को भी अपनी जिंदगी साबित करनी पड़ी!’
सातारा के रवींद्र जाधव की कहानी सुनकर व्यवस्था की कार्यशैली पर सवाल खड़े होते हैं। व्यक्ति सामने खड़ा है, सांस ले रहा है, लेकिन सरकारी कागज कहता है- ‘यह व्यक्ति नहीं है!’ वाह रे प्रशासन! पहले इंसान जीता है, फिर सरकार तय करती है कि वह जिंदा है या नहीं। ग्यारह महीने से एक नागरिक अपनी ही जिंदगी का सबूत लेकर दर-दर भटक रहा है। आधार बंद, काम बंद, योजनाएं बंद… मगर परेशानी चालू! आज हालत यह है कि इंसान को अपनी पहचान बताने के लिए पहचान पत्र चाहिए और पहचान पत्र को फिर से जिंदा करने के लिए इंसान को खुद जिंदा साबित करना पड़ता है।
‘अफवाहों का सिलेंडर इतना बड़ा, कि सच की लौ भी छोटी पड़ गई!’
सोशल मीडिया पर खबर चली कि ३० जून के बाद गैस सिलेंडर मिलना बंद हो जाएगा। लोगों ने सोचना शुरू कर दिया कि अब रसोई में चूल्हा भी इतिहास बन जाएगा। लेकिन असली बात यह है कि नियम सभी ग्राहकों के लिए नहीं, बल्कि उन लोगों के लिए है, जिनके पास पीएनजी सुविधा उपलब्ध है और जिन्होंने उसका कनेक्शन लिया है। आज का दौर ऐसा है कि खबर पहले डराती है और बाद में सच सफाई देने आता है। ‘कहीं किसान नकली बीज से लड़ रहा है, कहीं आम आदमी नकली खबर से और कहीं नागरिक सरकारी कागजों से। देश में सबसे मुश्किल काम शायद खेती नहीं, बल्कि सच और अपनी पहचान बचाना हो गया है!’

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