राजन पारकर
अरे भाऊ, महाराष्ट्र का राजनीति अब सरकार-वगैरह में नहीं चल रहा है। पूरा मामला बन गया है-कौन सा नेता अपने घर में किसको टिकट देगा!
खडसे साहब ने इसको बोला-‘लाड़की बहू योजना’, लेकिन ई योजना सुनके लगता है जैसे राज्य में विकास नहीं, घरेलू साखरपुड़ा चल रहा है।
देखो न, गिरीश महाजन, सावकारे, किशोर पाटील, मंगेश चव्हाण के घर में अगर कोई छींक भी दे न, तो पार्टी बोलती-‘होगया! टिकट पक्का!’
राजनीति कम और घर का ओवाळणी कार्यक्रम ज्यादा लग रहा है।
अरे साड़ी-चोली की तरह टिकट बांट रहे हैं भाई!
खडसे बोलते-
‘मत नहीं दिया? तो निधि नहीं! ई राज्य सरकार है कि दारू की दुकान?’
सच बोलें तो आजकल विकास काम की शर्तें भी अजब-गजब हैं-
‘चार फोटो, दो सिग्नेचर और एक वोट-हमारे नाम का!’
निधि किसकी? जनता की,
पर रोकने का अधिकार किसके पास?
सत्ताधारी नेटाओं के घर का दामाद मंडल!
जैसे घर की मम्मी बच्चों से बोले-
‘पहले बताओ किसको वोट दिया था, तब रोटी मिलेगा!’
और महंगाई?
अरे भाई, सिलेंडर का दाम देख के लगता है नासा का रॉकेट खरीद रहे हो क्या?
तेल का भाव ऐसा-गलती से भी गिर गया न, तो लोग सोचना शुरू कर देंगे कि सोने का पानी चढ़ा है क्या?
और भ्रष्टाचार?
अरे साहब, महाराष्ट्र में तो वॉशिंग मशीन भी हाई-क्लास है।
जिसपे जितना आरोप, वो मशीन में डाला-एक चक्कर लगाया-
निकलते ही नेता बन जाता है-
‘कुर्ता-झकाझक, इमेज-धो-धाकर, पूरा साफ!’
जांच-पड़ताल की जरूरत ही नहीं.
पार्टी में आये मतलब-सीधा गंगा-स्नान प्रâी में!
राजनीति में ड्रामा पहले भी था, पर अब तो नया पैâशन चला है-
‘परिवार के सांस्कृतिक कार्यक्रम में राजनीतिक टिकट वितरण’
मतलब नेता नहीं, पूरा खानदान चुनाव लड़ रहा है।
जनता?
उनको सिर्फ ताली बजाने का काम दिया है-वो भी खाली गिलास लेकर।
खडसे की नाराजगी बिल्कुल सेट है।
महाराष्ट्र में आज सवाल यह नहीं-कि जनता का हक क्या है?
सवाल सिर्फ यह-
‘घर से कितने रिश्तेदार भेजे?’
निधि, पद, टिकट-सब नातेदारी के रजिस्टर ऑफिस से पास होते हैं.
जनता बेचारी-बस बाहर खड़ी रहती है, जैसे शादी में बुलावा नहीं आया।
कल जनता को बोलना पड़ेगा-
‘यह सरकार है या कौटुंबिक मिलन समारोह?’
अगर ऐसे ही चलता रहा न भाऊ,
तो अगली बार चुनाव आयोग को लिखना पड़ेगा-
‘महाराष्ट्र पारिवारिक मेळाव्यात स्वागत है-एंट्री सिर्फ रिश्तेदारों के लिए!’
