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संपादकीय : रवींद्र चव्हाण की सुपारी …दरअसल क्या होगा?

महाराष्ट्र में इस समय ‘महायुति’ नामक तीन पांवों की राजनीतिक व्यवस्था चल रही है। जब राज्य में महाविकास आघाड़ी सरकार सत्ता में थी तब तीन दल सत्ता में थे। उस समय भाजपा के लोग सरकार को ‘तीन पहियों वाला रिक्शा’ कहकर उसकी आलोचना करते थे। अब उनकी किस्मत में भी तीन पहियोंवाली रिक्शा की सरकार आई है। यह रिक्शा फिलहाल भटक गया है और ऐसी स्थिति में है कि कभी भी गड्ढे में गिर सकता है। राज्य में नगरपालिका चुनावों में उतार-चढ़ाव के कारण रिक्शा में ही झगड़े और कलह शुरू हो गए हैं। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रवींद्र चव्हाण रोज उठकर रिक्शा में बैठे दाढ़ी वाले व्यक्ति की दाढ़ी खींचकर उसका मजाक उड़ाते हैं, लेकिन सत्ता की लाचारी और ईडी जैसी संस्थाओं के डर से खुद को शिवसेना कहलाने वाले भाजपा के जूते चाट रहे हैं। रवींद्र चव्हाण ने घोषणा की, ‘नंबर दो वगैरह सभी झूठ है। नंबर दो की कोई कीमत नहीं होती है। सबकुछ देवाभाऊ ही हैं!’ दोनों नंबर दो इस पर चुप हैं। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष भी कह रहे हैं कि २ दिसंबर के बाद ‘गठबंधन’ का क्या नतीजा होगा और गठबंधन के दोनों ढोनेवाले गधे चुप हैं। नगरपालिका चुनावों के बाद महाराष्ट्र में बहुत कुछ होगा। शिंदे और उनके लोगों को फडणवीस-चव्हाण ने मुश्किलात में डाल दिया है। राज्य में नगरपालिका चुनावों में फडणवीस और शिंदे के बीच, सत्ता और पैसे का खेल चल रहा है। यह चुनाव गठबंधन में शामिल दो दलों के बीच ही लड़ा जा रहा है। महाराष्ट्र में जहां अनगिनत मुद्दे हैं, वहीं मुख्यमंत्री और उनके दो ‘उप’ नगरपालिका चुनावों को लेकर शोर मचा रहे हैं। महाराष्ट्र में यह पहली बार है कि नगरपालिका चुनावों में प्रचार के लिए पांच-छह हेलिकॉप्टर और निजी विमानों का इस्तेमाल किया जा रहा है। क्योंकि यह
भाजपा और शिंदे गुट
के बीच की प्रतिस्पर्धा है। श्रीमान शिंदे कहते हैं, ‘भाजपा को गठबंधन धर्म का पालन करना चाहिए। अगर इसका पालन नहीं किया गया तो संघर्ष होगा।’ लेकिन क्या शिंदे जैसे लोगों में भाजपा से लड़ने का नैतिक बल है? शिंदे अमित शाह के राजनीतिक आश्रित हैं और आश्रितों के लिए स्वाभिमान, संघर्ष आदि सब व्यर्थ हैं। आश्रितों को फेंके गए टुकड़ों पर गुजारा करना पड़ता है। फडणवीस चुनावी सभाओं में कहते हैं, ‘हमारे पास नीति, नियति है और निधि भी भरपूर है।’ जब राज्य के मुख्यमंत्री इस स्तर पर जाकर प्रचार करते हैं तो पंचायत और नगरपालिका चुनावों का महत्व केवल धन तक ही सीमित रह जाता है। सत्ता का विकेंद्रीकरण, जो इन चुनावों का मूल सार है, नष्ट हो जाता है। भाजपा और मिंधे गुट १० से १५ हजार रुपए प्रति वोट की कीमत तय करके एक-दूसरे के खिलाफ कारस्तानी रच रहे हैं। मतदाता ऐसे धन के आदी हो गए हैं और जो भी उन्हें धन देता है, उसका दुपट्टा अपने गले में डालकर ‘जिंदाबाद’ करने को तैयार रहते हैं। उनके पास न नीति है, न नियति। बस धन और धन का ही खेल है। मिंधे गुट के ‘गुलाबो’ गिरोह का नेता कहता है, ‘चूंकि हमारे पास नगरीय विकास विभाग है इसलिए हमारे पास पैसा ही पैसा है। मतदाताओं को १ तारीख की सुबह से ही लक्ष्मी दर्शन होने लगेंगे।’ अंत में लक्ष्मी दर्शन में उलझे नगरपालिका चुनावों से लोगों के हाथ पांच-दस हजार के अलावा कुछ नहीं लगेगा। इन पांच-दस हजार के लिए मतदाता अपना भविष्य, महाराष्ट्र की इज्जत बेच रहे हैं, यह तस्वीर ठीक नहीं है। हालांकि, यह सच है कि ‘नंबर दो की कोई कीमत नहीं है, नंबर एक ही असली है’, फिर भी नंबर दो वाले जनसभाओं में मंत्रियों को फोन करके एमआईडीसी, अस्पताल, सड़क वगैरह देने की गारंटी देते हैं, लेकिन नंबर दो वाले जनसभाओं में चाहे जितनी भी ‘गारंटी’ दें, कर्ता-धर्ता तो मुख्यमंत्री ही हैं और साफ दिखाई दे रहा है कि उन्होंने
दोनों ही नंबर दो वालों की
पूरी नाकेबंदी कर दी है। मौजूदा दो नंबरी वास्तव में दस नंबरी हैं। शिवसेना ने उसे एक नंबरी बनाया। उसी एक नंबरी ने पीठ में छुरा घोंपा और भाजपा के दो नंबरी की नौकरी स्वीकार कर ली। अब अगर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष कह रहे हैं कि इन दो नंबरियों का कोई सच नहीं हैं तो हमें उनकी बात पर विश्वास करना चाहिए। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रवींद्र चव्हाण, देवेंद्र फडणवीस को सूचित किए बिना कोई भी ऐसे-वैसे बयान नहीं देंगे। शिंदे गुट के शाहजी पाटील ने भी हाल ही में स्पष्ट किया कि ‘भाजपा की गुलामी करना हमारी नियति है।’ यह सच है। वे अपने कर्मों का फल भोग रहे हैं। भविष्य में, शिंदे गुट अजगर के जाल में फंस जाएगा और कम से कम ३५ विधायकों को निगलकर भाजपा डकार लेगी। रवींद्र चव्हाण के बयान का निहित अर्थ यही है। मिंधे गुट के निर्माता स्वयं भाजपाई ही हैं। यह मिंधे गुट का भ्रम है कि जब तक मोदी-शाह सत्ता में बैठे हैं, कोई उनका कुछ बिगाड़ नहीं सकता। मोदी-शाह और उनकी भाजपा किसी की भी नहीं है। हिंदूहृदयसम्राट ने मोदी-शाह की खूब मदद की। अगर वे हिंदूहृदयसम्राट के नहीं बन पाए, तो मिंधे कौन हैं? कोकण में मिंधे के विधायक नीलेश राणे के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। कई जगहों पर भाजपा के लोग मिंधे के लोगों को परेशान कर रहे हैं। मिंधे हताश होवâर बस यही कह रहे हैं, ‘यह ठीक नहीं है। गठबंधन का धर्म निभाओ।’ यह सच ही है कि नंबर दो की कोई कीमत नहीं होती। बाड़े पर बैठे कुत्ते उनकी बकबक और शेखी बघारने की परवाह नहीं करते। नगरपालिका चुनावों के बाद महाराष्ट्र में बहुत कुछ होगा। रवींद्र चव्हाण तो सुपारी कतरने में लग ही गए हैं।

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