राज्य चुनाव आयोग ने ही साबित कर दिया है कि उसका दिमाग सही ठिकाने नहीं है। चुनाव आयोग ने राज्य के १२ जिलों में नगरपालिकाओं और नगरपंचायतों के चुनाव की तारीख आगे बढ़ा दी है, जबकि चुनाव बस कुछ ही घंटे दूर है। आयोग को इतनी जल्दबाजी में चुनाव आगे बढ़ाने का कोई अधिकार नहीं है। यह आश्चर्यजनक है कि मुख्यमंत्री फडणवीस ने चुनाव आयोग पर गलत तरीके से काम करने का आरोप लगाया। २४६ नगरपालिकाओं और ४२ नगर पंचायतों के चुनावों के लिए मतदान २ दिसंबर को और मतगणना ३ दिसंबर को होनी थी। अब, अदालती वजहों का हवाला देते हुए १२ जिलों में मतदान २० दिसंबर को होगा और परिणाम २१ दिसंबर को घोषित किए जाएंगे। यह चुनाव आयोग द्वारा जानबूझकर की गई गड़बड़ी है। मुख्यमंत्री ने इस गड़बड़ी के बारे में आयोग के कान उमेठे हैं, लेकिन क्या चुनाव आयोग, जो मुख्यमंत्री के अधीन बिल्ली है, मुख्यमंत्री की अनुमति के बिना चुनाव की तारीख आगे बढ़ा सकता है? फिर राज्य में नगरपालिकाएं शहरी विकास विभाग के अंतर्गत आती हैं। तो क्या ऐन वक्त पर कुछ चुनावों को आगे धकेलने की गड़बड़ी के पीछे शहरी विकास विभाग की कोई भूमिका है? यह भी एक संदेह व्यक्त किया जा रहा है। मतदान आगे धकेलने की गड़बड़ी वास्तव में क्या है और इसे क्यों किया गया? महाराष्ट्र नगरपालिका चुनाव नियम, १९६६ के अनुसार, उम्मीदवारों को अपने आवेदन वापस लेने के लिए आवश्यक तीन दिन का समय दिए बिना ही कुछ चुनाव अधिकारियों ने चुनाव चिह्न बांट दिए। यह प्रक्रिया नियम के अनुकूल नहीं पाई गई इसलिए राज्य चुनाव आयोग ने महापौर पद के मामले में संबंधित उम्मीदवारों के चुनाव और पूरी चुनाव प्रक्रिया को स्थगित कर दिया। ऐसे समय में जब प्रचार अभियान थम रहा है और मतदान की तैयारियां चल रही हैं, चुनाव आगे धकेलना संदिग्ध है। इनमें मराठवाड़ा, विदर्भ, नासिक, पुणे के महत्वपूर्ण क्षेत्र की
नगरपालिकाएं और नगर पंचायतें
हैं। इस चुनाव में, तीनों सत्तारूढ़ दलों के बीच प्रतिस्पर्धा है और चूंकि प्रचार और मतदाताओं तक पहुंचने के लिए कम समय है तो क्या आयोग, जो एक सरकारी हाथ है, ने आगे की ‘सेटिंग’ के लिए भरपूर समय मिल जाए इसके लिए चुनाव आगे धकेलकर भाजपा की मदद की? संदेह की गुंजाइश है। बदलापुर, अंबरनाथ और ठाणे जिलों में भी चुनाव स्थगित कर दिए गए थे। दस साल के इंतजार के बाद अंबरनाथ नगरपालिका के चुनाव होने थे। यहां भाजपा और शिंदे गुट विभाजनकारी राजनीति में लगे हुए थे। अब भाजपा ने इस चुनाव को ‘हाईजैक’ कर लिया है। यह पैâसला राजनीतिक दलों और मतदाताओं को भ्रमित करनेवाला है। आमतौर पर चुनाव आयोग कीचड़ में बैठी भैंस की तरह होता है, लेकिन चुनाव स्थगित करते समय आयोग ने जो सक्रियता दिखाई, वह आश्चर्यजनक है। कम से कम एक सर्वदलीय बैठक बुलाई जानी चाहिए थी और ऐसे गंभीर मुद्दे पर चर्चा होनी चाहिए थी। ऐसा कुछ नहीं हुआ और चौंकाने वाली खबर प्रकाशित हुई कि मुख्यमंत्री खुद इस पैâसले से हैरान थे। पुणे, सातारा, सोलापुर, चंद्रपुर, यवतमाल, अहिल्यानगर, धाराशिव और नांदेड़ जिलों में चुनाव अब लटक गए हैं। इसके अलावा, बारामती, फलटण, महाबलेश्वर, अंबरनाथ, कोपरगांव, देवलाली, प्रवर, नेवासा, पाथर्डी, मंगलवेढ़ा, तलेगांव, लोनावाला, मुखेड़, धर्माबाद, भोकर, डिग्रस, पांढरकवड़ा, वणी, अंजनगांव, सुर्जी और गोंदिया जैसी प्रमुख नगरपालिकाएं भी आयोग की गड़बड़झाला से प्रभावित हुईं। यह दूल्हा-दुल्हन के सप्तपदी से पहले ही मंत्रोचार करनेवालों के गायब हो जाने से शादी के स्थगित होने जैसा ही मामला है। यह राज्य में लापरवाह प्रशासन और अराजकता का प्रताप है। यह मामला संपूर्ण राज्य को
बंधुआ बनाने का
है। पूरी सरकार, खुद मुख्यमंत्री और उनके दो ‘डिप्टी’ नगरपालिका चुनाव के प्रचार में लगे हुए हैं। इससे महाराष्ट्र के असली मुद्दे रामभरोसे हैं इसलिए जहां एक ओर ऐसा लग रहा है कि सरकार इन चुनावों के बाद काम शुरू कर देगी, वैसे ही कुछ जगहों पर चुनाव आगे धकेल दिए गए हैं इसलिए पिछले कुछ समय से चुनावी कामों में लगे ‘सरकारी बाराती’ एक चरण का चुनाव संपन्न होने के बाद दूसरे चरण के चुनावों के लिए फिर से बाहर आ जाएंगे। एक ओर सत्ताधारी दल ने इन चुनावों के लिए भारी-भरकम ‘थैलियां’ खाली कीं और मतदाताओं को लक्ष्मीदर्शन का लाभ भी हुआ। अब जब चुनाव आगे बढ़ रहे हैं तो यह खर्च और बढ़ जाएगा। मतदाताओं को नए सिरे से लक्ष्मीदर्शन कराकर मतदान के लिए ले जाना होगा। इन चुनावों को पिछले चार दशकों के सबसे महंगे और भ्रष्ट चुनावों के रूप में देखना होगा। महाराष्ट्र पर आठ लाख करोड़ रुपए का कर्ज है। महाराष्ट्र कर्ज के बोझ तले दबा हुआ है, लेकिन नगरपालिका चुनावों में करोड़ों रुपए लुटाए जा रहे हैं और सत्ताधारी दलों के भीतर ही मतदाताओं को खरीदने की होड़ मची हुई है। यह बेशर्मी की पराकाष्ठा है। मुख्यमंत्री और दोनों ‘उप’ चुनावी सभाओं के माध्यम से जनता से मनचाहे वादे कर रहे हैं। सरकारी खजाने में उन्हें फिर से पूरा करने के लिए पैसा कहां है? बेशक, सरकारी खजाने में पैसा न हो, लेकिन सत्ताधारियों के निजी खजाने मजबूत हैं और उसी पर चुनावी खेल खेला जा रहा है। इस खेल में चुनाव आयोग एक जोकर है। सरकार, खासकर भाजपा ने चुनाव आयोग को जोकर बना दिया है। अगर ऐसा न होता तो चुनाव आयोग १२ जिलों में चुनाव आगे धकेलकर अराजकता न पैâलाता, जबकि मतदाता लक्ष्मीदर्शन करके वोट डाल रहे थे। यह अराजकता और भ्रम सुनियोजित है। इसके पीछे भाजपा को फायदा पहुंचाने की मंशा है। मुख्यमंत्री फडणवीस राज्य चुनाव आयोग पर इस तरह पहले कभी नहीं बरसे हैं। नाटक का रंग तो अच्छा जमा, लेकिन तीसरा अंक फंस गया है। आयोग भी लक्ष्मीदर्शन के खेल में शामिल हो गया। फिलहाल के लिए बस इतना ही!
