मुख्यपृष्ठधर्म विशेषसुखदाता है श्री दत्तात्रेय

सुखदाता है श्री दत्तात्रेय

मार्गशीर्ष चतुर्दशी तिथि को दत्त जयंती मनाई जाती है। भगवान दत्तात्रेय के जन्म दिवस को दत्त जयंती के रूप में मनाया जाता है। हिंदू धर्म में भगवान दत्तात्रेय को त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश का एकरूप माना गया है। धर्म ग्रंथों के अनुसार श्री दत्तात्रेय भगवान विष्णु के छठवें अवतार हैं। वे आजन्म ब्रह्मचारी, अवधूत और दिगम्बर रहे, इसलिए वे सर्वव्यापी कहलाए। यही वजह है कि तीनों ईश्वरीय शक्तियों से समाहित भगवान दत्तात्रेय की आराधना बहुत ही सफल, सुखदायी और शीघ्र फल देने वाली मानी गई है। मन, कर्म या वाणी से की गई उनकी उपासना भक्त को हर कठिनाई से मुक्ति दिलाती है।
धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु के पहले अवतार श्री सनकादि मुनि माने गए हैं, जबकि दूसरे वराह अवतार, तीसरे नारद अवतार, चौथे नर-नारायण, पांचवें कपिल मुनि, छठवें दत्तात्रेय अवतार, सातवें भगवान यज्ञ तो आठवें भगवान ऋषभदेव हैं। श्रीकृष्ण उनके बाइसवें अवतार माने गए हैं। कहा जाता है कि भगवान भोले का साक्षात रूप दत्तात्रेय में मिलता है। जब वैदिक कर्मों का, धर्म का तथा वर्णव्यवस्था का लोप हुआ, तब भगवान दत्तात्रेय ने सबका पुनरुद्धार किया था। हैहयराज अर्जुन ने अपनी सेवाओं से उन्हें प्रसन्न करके चार वर प्राप्त किए थे। पहला बलवान, सत्यवादी, मनस्वी, अदोषदर्शी तथा सहस्त्र भुजाओं वाला बनने का। दूसरा जरायुज तथा अंडज जीवों के साथ-साथ समस्त चराचर जगत का शासन करने के सामर्थ्य का। तीसरा देवता, ऋषियों, ब्राह्मणों आदि का यजन करने तथा शत्रुओं का संहार कर पाने का तथा चौथा इहलोक, स्वर्गलोक और परलोक विख्यात अनुपम पुरुष के हाथों मारे जाने का।
एक बार माता लक्ष्मी, पार्वती व सरस्वती को अपने पातिव्रत्य पर अत्यंत गर्व हो गया। भगवान ने इनका अंहकार नष्ट करने के लिए लीला रची। उसके अनुसार एक दिन नारदजी घूमते-घूमते देवलोक पहुंचे और तीनों देवियों को बारी-बारी जाकर कहा कि ऋषि अत्रि की पत्नी अनुसूइया के सामने आपका सतीत्व कुछ भी नहीं। तीनों देवियों ने यह बात अपने स्वामियों को बताई और उनसे कहा कि वे अनुसूइया के पातिव्रत्य की परीक्षा लें। तब भगवान शंकर, विष्णु व ब्रह्मा साधु वेश बनाकर अत्रि मुनि के आश्रम आए। महर्षि अत्रि उस समय आश्रम में नहीं थे। तीनों ने देवी अनुसूइया से भिक्षा मांगी मगर यह भी कहा कि आपको निर्वस्त्र होकर हमें भिक्षा देनी होगी। अनुसूइया पहले तो यह सुनकर चौंक गई, लेकिन फिर साधुओं का अपमान न हो इस डर से उन्होंने अपने पति का स्मरण किया और बोला कि यदि मेरा पातिव्रत्य धर्म सत्य है तो ये तीनों साधु छह-छह मास के शिशु हो जाएं। ऐसा बोलते ही त्रिदेव शिशु होकर रोने लगे। तब अनुसूइया ने माता बनकर उन्हें गोद में लेकर स्तनपान कराया और पालने में झूलाने लगीं। जब तीनों देव अपने स्थान पर नहीं लौटे तो देवियां व्याकुल हो गईं। तब नारद ने वहां आकर सारी बात बताई। तीनों देवियां अनुसूइया के पास आईं और क्षमा मांगी। तब देवी अनुसूइया ने त्रिदेव को अपने पूर्व रूप में कर दिया। प्रसन्न होकर त्रिदेव ने उन्हें वरदान दिया कि हम तीनों अपने अंश से तुम्हारे गर्भ से पुत्र रूप में जन्म लेंगे। तब ब्रह्मा के अंश से चंद्रमा, शंकर के अंश से दुर्वासा और विष्णु के अंश से दत्तात्रेय का जन्म हुआ। कार्तवीर्य अर्जुन (कृतवीर्य का ज्येष्ठ पुत्र) के द्वारा श्रीदत्तात्रेय ने लाखों वर्षों तक लोक कल्याण करवाया था। कृतवीर्य हैहयराज की मृत्यु के उपरांत उनके पुत्र अर्जुन का राज्याभिषेक होने पर गर्ग मुनि ने उनसे कहा था कि तुम्हें श्रीदत्तात्रेय का आश्रय लेना चाहिए, क्योंकि उनके रूप में विष्णु ने अवतार लिया है।
दत्त जयंती के अवसर पर भगवान दत्तात्रेय की प्रतिमा को लाल वस्त्र पर स्थापित कर चंदन-धूप, पुष्प-नैवेद्य से उनकी आरती उतारनी चाहिए। पूजा के समय उनके स्तोत्र पाठ किया जाना चाहिए। उनके चरणों की भी पूजा की जाती हैं ऐसी मान्यता हैं कि भगवान दत्तात्रेय गंगा स्नान के लिए आते हैं इसलिए गंगा मैया के तट पर दत्त पादुका की पूजा की जाती है। मान्यता है कि इस दिन पवित्र नदियों पर स्नान किया जाना चाहिए। भगवान दत्तात्रेय की पूजा महाराष्ट्र में धूमधाम से की जाती है। उनको गुरु के रूप में पूजा जाता है।
– शीतल अवस्थी

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