एम. एन. एस
एसआईआर की हकीकत तो छत्तीसगढ़ के उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बयान से साफ हो गई है। छत्तीसगढ़ के उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा का बयान आया है कि २००३ की मतदाता सूची से बाहर जो लोग हैं उन्हें चिह्नित कर फॉरेनर एक्ट के तहत उनकी नागरिकता खत्म करने की कार्रवाई की जाएगी। साथ ही बहुत से कानूनी प्रावधानों के तहत उन्हें जेल भेजा जाएगा। इधर, कुछ दिनों पहले उत्तर प्रदेश की सरकार ने भी घोषणा की थी कि जिनका नाम २००३ की मतदाता सूची में नहीं है उनके लिए असम की तर्ज पर डिटेंशन सेंटर बनाकर उन पर कार्रवाई की जाएगी।
साथ ही पश्चिम बंगाल के प्रमुख भाजपा नेता और मुख्यमंत्री बनने के लिए प्रतीक्षारत शुभेंदु अधिकारी ने भी कहा है कि अगर सही तरीके से बंगाल में एसआईआर को लागू किया जाए तो आगामी चुनाव में ममता बनर्जी तृणमूल कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो जाएगा और भाजपा प्रचंड बहुमत से जीतेगी।
अब तो किसी को भी फासीवादी संघ- भाजपा की मंशा पर शक नहीं होना चाहिए, क्योंकि यदि एसआईआर चुनाव आयोग की एक रूटीन प्रक्रिया है (जो कि नहीं है) तो भाजपा इसमें इतनी रुचि क्यों दिखा रही है। ठीक इसी जगह पर भारत का चुनाव आयोग, भाजपा के ‘घुसपैठिए भगाओ एजेंडा’ को तल्लीनता और पूर्ण स्वामिभक्ति से पूरा करता नजर आता है, जबकि बिहार में एसआईआर के बाद कितने घुसपैठियों-बांग्लादेशी या रोहिंग्या को चिह्नित किया गया है, यह चुनाव आयोग ने अभी तक नहीं बताया। कौन नागरिक है, कौन नहीं ये तय करनेवाला न तो चुनाव आयोग है और न ही फासिस्ट संघ परिवार। फिर भी एसआईआर को बिना किसी रोक-टोक के लागू करने के लिए भाजपा और चुनाव आयोग मरे जा रहे हैं इसीलिए ये बात दिन के उजाले की तरह साफ है कि एसआईआर का मकसद पारदर्शी मतदाता सूची बनाना और सही मतदाताओं को जोड़ना नहीं है, बल्कि इसका काम ही है वैध मतदाताओं और नागरिकों का नाम मतदाता सूची से काटना तथा उनकी नागरिकता खत्म करना। इन मायनों में एसआईआर, सीएए/ एनआरसी से भी खतरनाक है। एसआईआर का मकसद ही है मतदाता चोरी करना और अडानी सरीखे महाभ्रष्ट कॉरपोरेट घरानों की लठैत नफरत और विभाजन की सौदागर संघी भाजपा को हमेशा-हमेशा के लिए भारत की सत्ता में बने रहने का अवसर प्रदान करना। चाहे इसके लिए २८ क्यों २८० बीएलओ की जान भी क्यों नहीं चली जाए…
