-बीमारी परोस रहे कारोबारी…मुंबईकरों की सेहत से खिलवाड़
सुनील ओसवाल / मुंबई
दूषित जल संकट के बाद मुंबई में पैक्ड पानी की मांग तेजी से बढ़ी है। सोसायटियों, दफ्तरों, दुकानों और चॉल इलाकों तक वैâन और बोतलों की आपूर्ति धड़ल्ले से हो रही है। लेकिन इसी बढ़ती मांग के बीच एक गंभीर खतरा भी चुपचाप घर-घर पहुंच रहा है- अशुद्ध मिनरल वॉटर। कई इलाकों में बिक रहे बोतलबंद और वैâन वाले पानी की गुणवत्ता की पड़ताल में पता चला है कि बड़ी संख्या में सप्लाई किए जा रहे पानी का टीडीएस मानक तय सीमा से या तो बहुत कम है या फिर खतरनाक रूप से अधिक। हालांकि, मुनाफे के चक्कर में कारोबारी मिनिरल वॉटर के नाम पर लोगों की सेहत से खिलवाड़ कर मुंबईकरों को धड़ल्ले से बीमारी परोस रहे हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक, पीने के पानी के लिए १५० से ३०० टीडीएस को आदर्श माना जाता है। इससे कम होने पर पानी शरीर को जरूरी खनिज नहीं दे पाता और ज्यादा होने पर किडनी, पाचन तंत्र व ब्लड प्रेशर जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ता है।
निर्धारित मानकों पर फेल
मुंबई के उपनगरों, पूर्वी उपनगरों और कुछ मध्य मुंबई इलाकों में छोटी-बड़ी दुकानों से लिए गए वैâन और बोतलों की जांच में ऐसे नमूने मिले, जिनका टीडीएस कहीं ५०-६०, कहीं ९०-१०० तो कहीं ५०० से ऊपर तक पाया गया। कहीं ‘मरा हुआ पानी’ बिक रहा है, जिसमें खनिज नहीं, तो कहीं भारी घुलनशील तत्वों से भरा पानी, जो धीरे-धीरे शरीर पर वार करता है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह गड़बड़ी सिर्फ लोकल सप्लायर तक सीमित नहीं दिखी। कुछ जगहों पर ब्रांडेड बोतलों और नामी सप्लाई चैन से आए वैâन भी मानकों पर खरे नहीं उतरे। यानि मुंबईकर जो पानी ‘शुद्ध’ मानकर पी रहे हैं, वह असल में सिर्फ प्यास बुझा रहा है, सेहत नहीं।
डॉक्टरों ने दी चेतावनी
शहर के चिकित्सकों के अनुसार, बहुत कम टीडीएस वाला पानी लंबे समय तक पीने से शरीर में वैâल्शियम, मैग्नीशियम, पोटैशियम जैसे जरूरी तत्वों की कमी हो सकती है। वहीं ज्यादा टीडीएस वाला पानी किडनी स्टोन, ब्लड प्रेशर, जोड़ों के दर्द और पाचन संबंधी बीमारियों को जन्म दे सकता है।
सो रहा मनपा व एफडीए प्रशासन
नियमों के मुताबिक, पैक्ड ड्रिंकिंग वॉटर की गुणवत्ता की जिम्मेदारी एफडीए, मुंबई मनपा और स्वास्थ्य विभाग पर है। लेकिन सवाल यह है कि जब मुंबई में रोज लाखों लीटर पानी वैâन और बोतलों में बिक रहा है, तो नियमित और सार्वजनिक जांच रिपोर्ट कहां है? कितने प्लांट सील हुए? कितनों के लाइसेंस रद्द हुए? और कितने अब भी ‘शुद्ध’ के नाम पर धंधा कर रहे हैं?
बढ़ी मांग, ढीली निगरानी
पाइपलाइन लीकेज, गंदे पानी की शिकायतों और टैंकर निर्भरता के चलते मुंबई में पैक्ड पानी की खपत बीते महीनों में १५-२० फीसदी बढ़ी है। इसी बढ़ी मांग ने पानी के कारोबार को कमाई का खुला मैदान बना दिया है, जहां गुणवत्ता से ज्यादा प्राथमिकता मुनाफे को मिल रही है। ऐसे में जब तक मनपा और एफडीए की सख्त और पारदर्शी जांच जमीन पर नहीं दिखती, तब तक हर बोतल पर लिखा ‘प्योर’ शब्द, महज एक लेबल ही रहेगा, भरोसा नहीं।
