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चुनाव आयोग का ‘भयंकर पक्षपात’…सत्ता की ‘हां’ में हां, विपक्ष के लिए ‘ना’!

– पुनर्मतगणना पर खुलकर दिखा दोहरा चरित्र

-शिंदे गुट की मांग मानी, शिवसेना की ठुकराई

सामना संवाददाता / मुंबई

लोकतंत्र की मतगणना में सत्ता का खेल एक बार फिर खुलेआम सामने आ गया है। इसमें चुनाव अफसरों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं, क्योंकि मतगणना के दौरान उनका खुला पक्षपात उजागर हुआ है। आरोप है कि शिंदे गुट के लिए नियमों को तोड़ा-मरोड़ा गया, जबकि शिवसेना की वैध और जायज मांगों को जानबूझकर ठुकरा दिया गया। खासतौर पर वार्ड २२७ में पुनर्मतगणना की मांग को सिरे से खारिज कर देना यह साफ करता है कि मतगणना प्रक्रिया में निष्पक्षता की जगह सत्ता का दबाव हावी रहा। इससे पूरे चुनावी तंत्र की पारदर्शिता और लोकतांत्रिक भरोसे पर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है।
मुंबई मनपा के २२७ प्रभागों की मतगणना खबर लिखे जाने तक जारी थी, लेकिन इस मतगणना प्रक्रिया के दौरान सत्ताधारी दल के प्रति चुनाव अधिकारियों का झुकाव साफतौर पर देखने को मिला। इसका कारण यह है कि मुंबई के वार्ड क्रमांक १९० से शिवसेना की वैशाली पाटणकर को पहले विजयी घोषित किया गया था। बाद में भाजपा उम्मीदवार शीतल गंभीर को विजेता घोषित कर दिया गया। इसके बाद शिवसेना की उम्मीदवार वैशाली पाटणकर ने पुनर्मतगणना की मांग की, लेकिन चुनाव अधिकारियों ने उनकी यह मांग खारिज कर दी।
शिंदे गुट की मांग पर दो बार पुनर्मतगणना
दूसरी ओर शिंदे गुट के सदा सरवणकर की पुत्री प्रिया गुरव-सरवणकर को वार्ड क्रमांक १९१ से हार का सामना करना पड़ा। यहां से शिवसेना की विशाखा राऊत विजयी हुर्इं। हालांकि, राऊत की जीत पर सरवणकर ने आपत्ति जताई और पुनर्मतगणना की मांग की। चुनाव अधिकारियों ने उनकी मांग पर न केवल एक बार, बल्कि दो बार पुनर्मतगणना करवाई। दोनों बार पुनर्मतगणना के बाद भी विशाखा राऊत को ही सर्वाधिक मत मिलने पर विजयी घोषित करना पड़ा।

मेरी विजय छीनी गई है
वार्ड क्रमांक २२७ में चुनाव अधिकारियों का पक्षपाती रवैया सामने आया। यहां शिवसेना की वैशाली पाटणकर को पराजित घोषित किए जाने के बाद उन्होंने पुनर्मतगणना की मांग की, जिसे स्वीकार नहीं किया गया। इस दौरान मीडिया से बातचीत में वैशाली पाटणकर ने कहा कि मेरी विजय छीनी गई है। मैं इस परिणाम के खिलाफ अदालत में याचिका दायर करूंगी। साथ ही वैशाली पाटणकर ने चुनाव निर्णय अधिकारियों पर मशीन बदलने का गंभीर आरोप भी लगाया है। कुल मिलाकर इस पूरे घटनाक्रम से यह स्पष्ट होता है कि चुनाव अधिकारियों ने सत्ताधारी दल के उम्मीदवार को पक्षपातपूर्ण लाभ दिया है।

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